मुनि विष्णु सागर जी महाराज की स्मृति में विनयांजलि सभा
Delhi, 19 मार्च 2026। पूज्य मुनि श्री 108 विष्णु सागर जी महाराज (गृहस्थ जीवन में श्री प्रदीप जैन “आदित्य”) की पावन स्मृति में नई Delhi स्थित मावलंकर हॉल, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में 18 मार्च 2026 को विनयांजलि सभा आयोजित की गई। यह कार्यक्रम श्रद्धा, भक्ति और गरिमा से परिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। सभा में देशभर से आए संत, समाजजन और गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया।
दीप प्रज्वलन और उद्घाटन
सभा का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ। सांसद मनोज तिवारी, वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री दिग्विजय सिंह, कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी और श्री प्रदीप जैन “आदित्य” ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया। इस अवसर पर आचार्य 108 श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज, लोकेश मुनि, श्री योगभूषण जी महाराज सहित अनेक संतों का मंगल सान्निध्य प्राप्त हुआ।
संलेखना का महत्व
आचार्य 108 श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में संलेखना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि संलेखना केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, त्याग और संयम की सर्वोच्च साधना है। इससे व्यक्ति अपने राग-द्वेष और मोह का त्याग कर आत्मा को निर्मल बनाता है।
वे बोले कि संलेखना जीवन के अंतिम क्षणों को भी पवित्र और सार्थक बना देती है तथा मृत्यु को उत्सव के रूप में स्वीकार करने की प्रेरणा देती है। उन्होंने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए बताया कि सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने भी अपने जीवन के अंतिम समय में संलेखना धारण की थी।
संतों और समाजजन की उपस्थिति
सभा में समाज के गणमान्य नागरिक, धार्मिक नेता और श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गजराज जैन गंगवाल, ग्लोबल महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जमुनालाल हपावत, तीर्थ क्षेत्र कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जम्मू प्रसाद जैन, दिगंबर जैन परिषद के पुनीत जैन सहित अनेक प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित रहे।

मनोज तिवारी और अन्य वक्ताओं का संदेश
सांसद मनोज तिवारी ने कहा कि प्रदीप जैन “आदित्य” का जीवन धार्मिकता और सादगी का उदाहरण है। पूर्व मंत्री दिग्विजय सिंह ने अहिंसा और “जियो और जीने दो” सिद्धांत का महत्व बताया। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने भी पूज्य मुनि विष्णु सागर जी के योगदान की प्रशंसा की।
मुनि श्री विष्णु सागर जी की शिक्षाएं
आचार्य 108 श्री प्रज्ञा सागर जी महाराज ने बताया कि संलेखना साधना जीवन के अंतिम क्षणों को भी पवित्र और अर्थपूर्ण बनाती है। यह साधना न केवल साधु-संतों तक सीमित है, बल्कि गृहस्थ जीवन में भी अपनाई जा सकती है।
मुनि श्री विष्णु सागर जी ने अपने जीवन में यह दिखाया कि सादगी, सेवा और त्याग ही सच्चे संत जीवन की पहचान हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि धन और भौतिक संपत्ति के बजाय धर्म और मानवता की सेवा सर्वोच्च है।
वसीयतनामा और प्रेरक संदेश
सभा में कांग्रेस प्रवक्ता गौरव जैन ने मंच से मुनि श्री विष्णु सागर जी का वसीयतनामा पढ़ा। इसमें उन्होंने लिखा कि जीवन में एक पैसे की भी आवश्यकता नहीं है और सारी पूंजी धर्म कार्यों में लगाई जाए।
गौरव जैन ने बताया कि उनके दादाजी का जीवन सादगी, सेवा और धर्म के प्रति समर्पित रहा। उनका यह अंतिम संदेश परिवार और समाज दोनों के लिए मार्गदर्शक है।

परिवार और समाज का योगदान
पूज्य मुनि विष्णु सागर जी की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में उनके परिवार के सदस्य और समाजजन भी उपस्थित थे। उनकी पुत्री श्रीमती सुधा जैन ने भावुक रूप से अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संलेखना मृत्यु को शोक का विषय नहीं बल्कि आत्मा की यात्रा का उत्सव बनाती है।
कार्यक्रम का समापन
सभा का संचालन झांसी जैन समाज के महामंत्री कमल जैन लोकपथ और कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रभारी अशोक जैन “क्रांतिकारी” ने किया। सभी उपस्थित जनों ने मुनि श्री विष्णु सागर जी को भावभीनी विनयांजलि अर्पित की और उनकी आत्मा की शांति हेतु प्रार्थना की।
निष्कर्ष
पूज्य मुनि श्री विष्णु सागर जी महाराज का जीवन और उनकी संलेखना साधना आज भी समाज और परिवार के लिए प्रेरणा का स्रोत है। इस सभा ने उनके त्याग, वैराग्य और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को जीवंत किया।
संलेखना केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और जीवन की श्रेष्ठता का प्रतीक है, जो समाज में नैतिकता, सादगी और सेवा की भावना को प्रोत्साहित करता है।
