Bhopal में लोकायुक्त की बड़ी कार्रवाई: नगर निगम में फर्जी बिलिंग मामले की जांच, 200 फाइलें जब्त
भोपाल, 16 मार्च 2026:
Bhopal नगर निगम में फर्जी बिल बनाकर भुगतान करने के आरोपों की जांच के लिए लोकायुक्त पुलिस ने एक बड़े पैमाने पर छापेमारी अभियान चलाया। यह कार्रवाई सुबह 11:30 बजे से शुरू होकर शाम 6:00 बजे तक लगातार लगभग 6 घंटे चली। निगम के विभिन्न विभागों के दफ्तरों के ताले खोले गए और कर्मचारियों से पूछताछ की गई। इस छापेमारी में शामिल विभागों में नगर निगम गैराज, सीवेज विभाग, सिविल विभाग, तालाब संरक्षण विभाग सहित अन्य प्रमुख शाखाएँ शामिल थीं।
लोकायुक्त संगठन ने इस कार्रवाई को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया। प्रारंभिक निरीक्षण में यह देखा गया कि निगम में कई बिल फर्जी तरीकों से तैयार किए गए थे और उन्हें सिस्टम में दर्ज करके भुगतान किया गया। इस मामले में अब तक नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों के अलावा सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी के इंजीनियरों से भी पूछताछ की जा रही है।
छापेमारी का विस्तृत विवरण
लोकायुक्त पुलिस ने इस एक दिन की छापेमारी के दौरान 200 से अधिक फाइलें जब्त कीं। इन फाइलों में अधिकांश में परचेस ऑर्डर (Purchase Order) का विवरण था, जिनका मिलान अब निगम के सेप (SAP-ERP) सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड से किया जाएगा। इस जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिन आदेशों को भौतिक रूप से तैयार किया गया, क्या उन्हें सॉफ्टवेयर में सही ढंग से दर्ज किया गया या नहीं।
टीम ने निगम के सेप सॉफ्टवेयर बनाने वाली ई-कॉमर्स कंपनी के इंजीनियरों को भी पूछताछ के लिए बुलाया। इंजीनियरों से यह जानकारी लेने का प्रयास किया जा रहा है कि सॉफ्टवेयर सिस्टम में डेटा सही तरीके से दर्ज हुआ या नहीं, और क्या किसी प्रकार का मैन्युअल या फर्जी रिकॉर्ड सिस्टम में दर्ज किया गया।
लोकायुक्त पुलिस ने बताया कि छापेमारी में जिन विभागों पर ध्यान केंद्रित किया गया, वे मुख्य रूप से वित्तीय भुगतान, बिलिंग प्रक्रिया और कार्य निष्पादन के रिकॉर्ड से जुड़े हुए थे। इन सभी दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की तुलना करके यह पता लगाया जाएगा कि किन अधिकारियों और कर्मचारियों ने नियमों का उल्लंघन किया।
जांच का दायरा और समयसीमा
लोकायुक्त ने बताया कि इस मामले की जांच 2020 से अब तक नगर निगम में किए गए सभी कार्यों और बिलिंग रिकॉर्ड तक की जाएगी। यानी पिछले लगभग सात साल के वित्तीय और प्रशासनिक दस्तावेजों की गहन समीक्षा की जाएगी।
जांच का दायरा सिर्फ बिलिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह यह भी देखेगा कि निगम के विभिन्न विभागों के प्रमुख अधिकारी और अन्य स्टाफ ने अपने पद का दुरुपयोग तो नहीं किया। पिछले सात सालों में नगर निगम के विभिन्न शाखाओं में जिन अधिकारियों को विभाग प्रमुख के रूप में पदस्थ किया गया, उनकी सभी गतिविधियों का परीक्षण किया जाएगा।
लोकायुक्त संगठन ने स्पष्ट किया कि अगर आवश्यक हुआ, तो इन अधिकारियों की व्यक्तिगत और पारिवारिक संपत्ति की भी जांच की जा सकती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भ्रष्टाचार से अर्जित कोई संपत्ति तो नहीं है।
पूर्व अपर आयुक्त फाइनेंस पर मामला
नगर निगम के पूर्व अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर को पद से हटा दिया गया है। उनके स्थान पर मुकेश शर्मा को नया एडीसी वित्त बनाया गया।
लोकायुक्त ने सेवतकर के खिलाफ धोखाधड़ी, जाली दस्तावेज तैयार करने, फर्जी बिल बनाने और भुगतान करवाने जैसे आरोपों में मामला दर्ज किया है। लोकायुक्त एसपी दुर्गेश राठौर ने बताया कि सेवतकर ने फर्जी बिल तैयार कर उन्हें मंजूरी देकर भुगतान सुनिश्चित कराया।
हालांकि, वर्तमान में उनकी संपत्ति की जांच नहीं की गई है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उनकी संपत्ति की भी समीक्षा की जाएगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भ्रष्टाचार से अर्जित कोई धनराशि उनके पास न रह जाए।
फाइलों और सॉफ्टवेयर की जांच
छापेमारी के दौरान बरामद 200 से अधिक फाइलें बोरों में भरकर सुरक्षित रखी गई हैं। इन फाइलों में परचेस ऑर्डर और अन्य वित्तीय दस्तावेज शामिल हैं। अब इन दस्तावेजों का मिलान निगम के सेप सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड से किया जाएगा।
लोकायुक्त टीम यह जांच कर रही है कि क्या सभी भौतिक आदेश और डिजिटल रिकॉर्ड में समानता है, या किसी प्रकार का फ़र्जी डेटा दर्ज किया गया है। इस प्रक्रिया से यह पता चलेगा कि निगम के वित्तीय लेनदेन में कितनी अनियमितताएँ हुई हैं और किन अधिकारियों ने इसमें भाग लिया।
सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव
भोपाल लोकायुक्त की यह कार्रवाई प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। नगर निगम जैसे बड़े संस्थान में फर्जी बिलिंग और वित्तीय अनियमितताओं की घटना न केवल आर्थिक हानि पैदा करती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी प्रभावित करती है।
लोकायुक्त की इस कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि सरकारी संस्थानों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी अधिकारी सुरक्षित नहीं है। इससे आने वाले समय में प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार और वित्तीय नियंत्रण को सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी।
विशेष रूप से, यह जांच डिजिटल और भौतिक दोनों प्रकार के रिकॉर्ड को कवर करती है। इस कदम से यह भी स्पष्ट होगा कि तकनीक और सॉफ्टवेयर सिस्टम का दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया या नहीं।
भविष्य की कार्रवाई
लोकायुक्त ने यह संकेत दिया है कि सभी विभाग प्रमुखों और कर्मचारियों से पूछताछ की जाएगी। यह पूछताछ केवल वित्तीय दस्तावेजों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि अधिकारियों की भूमिका और उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया की भी समीक्षा होगी।
यदि जांच में कोई अधिकारी दोषी पाया गया, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाएगा कि किसी अधिकारी ने निजी हित में या किसी तीसरे पक्ष के लाभ के लिए वित्तीय नियमों का उल्लंघन किया।
निष्कर्ष
भोपाल लोकायुक्त की यह कार्रवाई नगर निगम में वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी बिलिंग के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम है। 200 से अधिक फाइलों की जब्ती और सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट होगा कि किसने नियमों का उल्लंघन किया और कितनी राशि का दुरुपयोग हुआ।
इस जांच से यह भी संदेश जाता है कि सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोकायुक्त की यह कार्रवाई भविष्य में भ्रष्टाचार को रोकने, प्रशासनिक नियंत्रण सुदृढ़ करने और जनता के विश्वास को बनाए रखने में मदद करेगी।
यह मामला केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपत्ति, वित्तीय जिम्मेदारी और तकनीकी नियंत्रण के पहलुओं को भी उजागर करता है। भविष्य में इसे अन्य नगर निगमों और सरकारी संस्थानों में भी पालन के लिए एक मिसाल माना जा सकता है।

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