Ujjain News: महाकाल मंदिर में भक्ति और परंपरा के साथ मनाई गई होली, भस्म आरती में चढ़ा हर्बल गुलाल
Ujjain News: धार्मिक नगरी Ujjain में स्थित विश्वप्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में मंगलवार को होली का पर्व पारंपरिक उत्साह और गहन आस्था के साथ मनाया गया। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के पावन अवसर पर तड़के हुई भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल को विशेष रूप से हर्बल गुलाल अर्पित कर होली उत्सव की शुरुआत की गई। सुरक्षा कारणों से इस वर्ष श्रद्धालुओं को मंदिर परिसर में रंग और गुलाल ले जाने की अनुमति नहीं दी गई, फिर भी भक्तों की आस्था में कोई कमी नहीं दिखी और सुबह से ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग गईं।
Ujjain भस्म आरती में विशेष हर्बल गुलाल अर्पण
महाकाल मंदिर में होली मनाने की परंपरा वर्षों पुरानी है। हर साल भक्त बाबा महाकाल के साथ होली खेलने की भावनाएं लेकर पहुंचते हैं। हालांकि पिछले वर्ष हुए हादसे को ध्यान में रखते हुए इस बार मंदिर समिति ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी थी। मंदिर परिसर में रंग, गुलाल और अन्य ज्वलनशील सामग्री ले जाने पर प्रतिबंध लगाया गया।
इसके बावजूद परंपरा का निर्वाह करते हुए भस्म आरती में भगवान महाकाल को सीमित मात्रा में हर्बल गुलाल अर्पित किया गया। यह गुलाल पूरी तरह प्राकृतिक तत्वों से तैयार किया गया था, ताकि धार्मिक परंपरा भी निभे और सुरक्षा मानकों का पालन भी हो सके। आरती के दौरान मंदिर में भक्ति का अद्भुत वातावरण बना रहा। “जय श्री महाकाल” के उद्घोष से पूरा परिसर गूंज उठा।
शक्कर और मखाने की माला से सजे बाबा
होली के अवसर पर भगवान महाकाल को विशेष श्रृंगार अर्पित किया गया। परंपरा के अनुसार उन्हें शक्कर की माला और मखाने की माला पहनाई गई। इसके साथ ही अन्य स्वरूपों — श्री चंद्रमौलेश्वर, श्री कोटेश्वर, श्री रामेश्वर और श्री वीरभद्र — को भी संध्या आरती से पूर्व गुलाल अर्पित किया गया।
मंदिर के पुजारियों ने बताया कि होली का यह उत्सव केवल रंगों का नहीं, बल्कि भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है। बाबा महाकाल को अर्पित किया गया गुलाल भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संदेश देता है।
सबसे पहले होलिका दहन की परंपरा
Ujjain महाकाल मंदिर में होलिका दहन की परंपरा विशेष मानी जाती है। मान्यता है कि यहां विश्व की पहली होलिका प्रज्ज्वलित होती है। इस वर्ष भी विधि-विधान से पूजन कर होलिका दहन किया गया। पुजारियों ने प्रह्लाद की अटूट भक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय की कथा का स्मरण कराया। श्रद्धालुओं ने सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
हालांकि मंदिर परिसर में रंग खेलने की अनुमति नहीं थी, फिर भी श्रद्धालुओं के चेहरे पर उल्लास स्पष्ट दिखाई दे रहा था। भक्तों ने केवल दर्शन और आरती में भाग लेकर ही पर्व की अनुभूति की।
रंगों पर रोक, लेकिन उमड़ी आस्था
सुरक्षा प्रतिबंधों के कारण इस बार मंदिर परिसर में खुले रूप से रंगों की छटा नहीं बिखरी। पिछले वर्षों की तुलना में वातावरण अपेक्षाकृत संयमित रहा, लेकिन भक्तों की संख्या में कोई कमी नहीं आई। सुबह से ही मंदिर के बाहर लंबी कतारें लग गई थीं। प्रशासन और मंदिर समिति ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया और प्रवेश द्वारों पर सघन जांच की गई।
श्रद्धालुओं ने नियमों का पालन करते हुए शांतिपूर्वक दर्शन किए। कई भक्तों का कहना था कि रंगों से अधिक महत्वपूर्ण भगवान के चरणों में उपस्थित होना है। भस्म आरती और होली का यह संगम उनके लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का स्रोत बना।
ग्रहण के चलते बदला पूजन क्रम
इस वर्ष होली के दिन चंद्र ग्रहण का संयोग भी बना। शासकीय पुजारी पं. घनश्याम शर्मा के अनुसार 3 मार्च को शाम 6:32 बजे से 6:46 बजे तक, कुल 14 मिनट का ग्रहण रहेगा। ग्रहण का वेदकाल सूर्योदय से ही प्रारंभ माना जाएगा।
ग्रहण को ध्यान में रखते हुए मंदिर के पूजन क्रम में आंशिक परिवर्तन किया गया। सुबह की उद्योदक और भोग आरती में भगवान को केवल शक्कर का भोग अर्पित किया गया। ग्रहण समाप्ति के बाद मंदिर परिसर का शुद्धिकरण किया जाएगा। इसके पश्चात भगवान का स्नान, पूजन और पुनः भोग अर्पण कर संध्या आरती संपन्न की जाएगी।
मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया कि ग्रहण काल में श्रद्धालुओं की गतिविधियों पर विशेष ध्यान रखा जाएगा और सभी धार्मिक नियमों का पालन किया जाएगा।
भक्ति और अनुशासन का अनूठा संगम
Ujjain महाकाल मंदिर में मनाई गई यह होली भक्ति और अनुशासन का अनूठा उदाहरण रही। जहां एक ओर सुरक्षा के चलते रंगों पर प्रतिबंध रहा, वहीं दूसरी ओर आस्था की गहराई ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा। हर्बल गुलाल से सजे भगवान महाकाल का दिव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के मन में बस गया।
इस अवसर पर देशभर से आए श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दर्शन कर अपने जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की। होली का यह पर्व एक बार फिर यह संदेश दे गया कि सच्ची आस्था बाहरी रंगों की मोहताज नहीं होती, बल्कि श्रद्धा और विश्वास ही सबसे बड़ा उत्सव है।
