Indore News : कैलाश विजयवर्गीय एक बार फिर राजनीतिक विवादों के केंद्र में आ गए हैं। मध्य प्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री के रूप में विधानसभा में दिए गए उनके एक जवाब ने न केवल विपक्ष को हमला करने का मौका दिया है, बल्कि उनकी अपनी पार्टी के भीतर भी असहजता की स्थिति पैदा कर दी है। मामला इंदौर नगर निगम में स्वीकृत और रिक्त पदों से जुड़ा है, खासकर सफाई कर्मचारियों और राजस्व विभाग के पदों को लेकर दिए गए आंकड़ों पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
विधानसभा में दिया गया जवाब और उठे सवाल
इंदौर-5 से बीजेपी विधायक महेंद्र हार्डिया ने विधानसभा में तारांकित प्रश्न के माध्यम से निगम में स्वीकृत पदों, रिक्त पदों और कार्यरत कर्मचारियों की स्थिति की जानकारी मांगी थी। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या कर्मचारियों की कमी के कारण एक ही अधिकारी को कई विभागों का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
20 फरवरी को विधानसभा में दिए गए जवाब में मंत्री विजयवर्गीय ने कहा कि निगम की सीमा विस्तार के कारण अमले की कमी है और इसी वजह से अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार दिए गए हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि जैसे ही पर्याप्त भर्ती होगी, अतिरिक्त प्रभार वापस ले लिए जाएंगे।
हालांकि, उनके जवाब के साथ प्रस्तुत किए गए आंकड़ों ने पूरे मामले को विवादों में ला दिया।
सफाई संरक्षकों के पदों पर बड़ा अंतर
मंत्री के अनुसार, इंदौर नगर निगम में कुल 6312 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 1493 पद भरे हुए हैं और 4819 पद रिक्त हैं। उन्होंने विशेष रूप से यह दावा किया कि सफाई संरक्षकों के 3900 स्वीकृत पद पूरी तरह खाली हैं और निगम में एक भी नियमित सफाई संरक्षक कार्यरत नहीं है।
यहीं से विवाद की शुरुआत हुई। निगम के आधिकारिक रिकॉर्ड्स और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, 1200 से अधिक नियमित सफाई संरक्षक इंदौर में कार्यरत हैं। इसके अलावा 2400 से अधिक विनियमित सफाई मित्र शहर की सफाई व्यवस्था संभाल रहे हैं।
मंत्री विजयवर्गीय ने इन विनियमित कर्मचारियों को निगम का आधिकारिक कर्मचारी मानने से इनकार कर दिया, जबकि व्यवहारिक रूप से शहर की सफाई व्यवस्था इन्हीं के भरोसे चल रही है। इंदौर की सफाई व्यवस्था देशभर में मिसाल मानी जाती है, ऐसे में कर्मचारियों की वास्तविक संख्या और उनकी स्थिति को लेकर भ्रम ने सवालों को और गहरा कर दिया है।
प्रमुख पदों को लेकर भी विरोधाभास
सिर्फ सफाई कर्मचारियों तक ही मामला सीमित नहीं है। मंत्री द्वारा महत्वपूर्ण पदों की स्थिति को लेकर भी जो जानकारी दी गई, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाती बताई जा रही है।
मुख्य स्वच्छता अधिकारी का पद उन्होंने भरा हुआ बताया, जबकि जानकारी के अनुसार यह पद लंबे समय से रिक्त है। उच्च न्यायालय के निर्देशों के मुताबिक इस पद पर केवल एमबीबीएस डिग्रीधारी चिकित्सक की नियुक्ति हो सकती है। फिलहाल निगम में ऐसा कोई अधिकारी पदस्थ नहीं है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह पद वास्तव में खाली है।
इसी प्रकार मुख्य नगर निवेशक का पद भी मंत्री ने भरा हुआ बताया, जबकि यह पद भी काफी समय से रिक्त बताया जा रहा है। ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर अस्पष्ट या गलत जानकारी दिए जाने से प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
राजस्व विभाग के आंकड़ों पर भी विवाद
राजस्व विभाग में स्वीकृत और भरे पदों के आंकड़े भी विवादों में हैं। मंत्री ने विधानसभा में बताया कि 24 राजस्व निरीक्षकों में से 8 पद भरे हैं और 15 रिक्त हैं। लेकिन निगम के भीतर से मिली जानकारी के अनुसार एक भी स्थायी राजस्व निरीक्षक कार्यरत नहीं है। वर्तमान में विनियमित कर्मचारी ही प्रभार के तौर पर काम संभाल रहे हैं।
उप राजस्व निरीक्षकों के 49 पदों में से 5 भरे होने की बात कही गई, जबकि यहां भी नियमित नियुक्ति नहीं है। सहायक राजस्व निरीक्षकों के 195 पदों में से 115 पद भरे बताए गए, परंतु इन पदों पर भी स्थायी कर्मचारी नहीं, बल्कि विनियमित और मस्टर रोल कर्मचारी ही जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
इस स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि कागजों पर और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर है। यदि नियमित नियुक्तियां नहीं हैं, तो प्रशासनिक स्थायित्व और जवाबदेही दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
ड्राइवरों को लेकर चौंकाने वाला दावा
सबसे अधिक चर्चा मंत्री के उस बयान को लेकर हो रही है जिसमें उन्होंने कहा कि इंदौर नगर निगम में केवल 3 ड्राइवर हैं और वे भी हल्के वाहनों के लिए नियुक्त हैं।
जबकि निगम के पास 1200 से अधिक वाहन हैं, जिनमें डंपर, ट्रक, जेसीबी, पोकलेन मशीनें और अन्य छोटे-बड़े वाहन शामिल हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार ड्राइवरों के 20 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 17 लंबे समय से रिक्त हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि नियमित ड्राइवरों की इतनी कमी है, तो इतनी बड़ी वाहन व्यवस्था का संचालन किस प्रकार किया जा रहा है? क्या यह कार्य भी अस्थायी या संविदा कर्मियों के भरोसे चल रहा है? यदि हां, तो यह स्थिति प्रशासनिक ढांचे की कमजोरी की ओर इशारा करती है।
विपक्ष का हमला और राजनीतिक प्रतिक्रिया
विधानसभा में इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने जोरदार हंगामा किया। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने मंत्री के बयान को “झूठ का पुलिंदा” करार दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा कि इंदौर की सफाई व्यवस्था विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन मंत्री के आंकड़े ‘खाली’ निकले।
कांग्रेस का आरोप है कि मंत्री ने सदन को गुमराह किया है और वास्तविक स्थिति छिपाने की कोशिश की है। वहीं बीजेपी के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर असहजता देखी जा रही है, क्योंकि सवाल खुद पार्टी के विधायक द्वारा पूछा गया था।
सीमा विस्तार और स्टाफ की कमी
निगम अधिकारियों का कहना है कि इंदौर नगर निगम की सीमा विस्तार के बाद कार्यक्षेत्र काफी बढ़ गया है। नए क्षेत्रों के जुड़ने से सफाई, राजस्व और अन्य विभागों में कार्यभार बढ़ा है। स्टाफ की कमी वास्तविक है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी की जा रही है।
हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि नियमित और विनियमित कर्मचारियों के बीच का अंतर प्रशासनिक और कानूनी जटिलताओं को जन्म देता है। यदि बड़ी संख्या में कर्मचारी संविदा या विनियमित आधार पर काम कर रहे हैं, तो उन्हें आधिकारिक आंकड़ों में शामिल न करना वास्तविक स्थिति को अधूरा दर्शाता है।
प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल
पूरा विवाद इस बात पर केंद्रित है कि क्या विधानसभा में प्रस्तुत किए गए आंकड़े तथ्यात्मक रूप से सही थे? यदि नहीं, तो जिम्मेदारी किसकी है? क्या विभागीय स्तर पर आंकड़ों की जांच में चूक हुई, या फिर सदन में गलत जानकारी प्रस्तुत की गई?
इंदौर जैसे शहर, जो स्वच्छता के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुका है, वहां कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति को लेकर भ्रम प्रशासनिक छवि को प्रभावित कर सकता है।
आगे क्या?
अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या मंत्री अपने बयान पर स्पष्टीकरण देंगे या आंकड़ों में सुधार प्रस्तुत करेंगे। विपक्ष इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश करेगा, जबकि सरकार के लिए यह आवश्यक होगा कि वह पारदर्शिता और तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करे।
भर्ती प्रक्रिया शुरू होने और रिक्त पदों को भरने की दिशा में ठोस कदम उठाना ही इस विवाद का स्थायी समाधान हो सकता है। फिलहाल, इंदौर नगर निगम के पदों को लेकर उठे सवालों ने प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक पारदर्शिता दोनों पर गंभीर चर्चा छेड़ दी है।

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