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2000 में Israel यात्रा के जरिए ज्योति बसु ने राजनीतिक टैबू तोड़ा

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Published On: 25 February 2026
How Jyoti Basu Broke Political Taboos with Israel Visit in 2000
— How Jyoti Basu Broke Political Taboos with Israel Visit in 2000

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ज्योति बसु की Israel यात्रा और पीएम मोदी के दौरे पर लेफ्ट की आलोचना: एक ऐतिहासिक और आधुनिक परिप्रेक्ष्य

भोपाल/कोलकाता: भारत में Israel के प्रति राजनीतिक रुख समय के साथ बदलता रहा है। कम्युनिस्ट पार्टियों ने लंबे समय तक Israel को अधिकार कब्जा करने वाला राज्य माना और उसके खिलाफ कड़े रुख अपनाए। लेकिन पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और कम्युनिस्ट नेता ज्योति बसु ने जून 2000 में इजरायल का दौरा कर इस परंपरागत नीति को तोड़ दिया था।

आज, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल दौरे पर हैं, लेफ्ट नेता एम ए बेबी ने इसे सार्वजनिक रूप से आलोचना का विषय बना दिया है। यह विरोध हमें इस सवाल पर ले जाता है कि क्या लेफ्ट ने ज्योति बसु के साहसिक कदम को भूल गया है या वर्तमान कूटनीति पर अपनी पुरानी सोच कायम रखी है।

ज्योति बसु का साहसिक फैसला

ज्योति बसु ने 2000 में इजरायल दौरे का निर्णय लिया, जब वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री थे। उनके इस कदम को राजनीतिक टैबू तोड़ने वाला माना गया। बसु ने एक बड़े बिजनेस प्रतिनिधिमंडल के साथ यात्रा की, जिसमें उन्होंने इजरायल के टॉप लीडर्स से मुलाकात की और व्यावहारिक सहयोग और नवाचार के क्षेत्र में संभावनाओं को समझा।

उन्होंने इस यात्रा से दो साल पहले, 1998 में, सोमनाथ चटर्जी को इजरायल भेजा था। यह कदम यह संकेत देता है कि बसु इजरायल की संभावनाओं को समझते हुए व्यावहारिक और आर्थिक दृष्टिकोण से निर्णय ले रहे थे।

ज्योति बसु और यासिर अराफात: दोस्ती का प्रभाव

बसु ने इजरायल के दौरे से पहले फिलीस्तीन के नेता यासिर अराफात से गहरी दोस्ती निभाई। उनके लिए यह यात्रा केवल राजनीतिक या व्यावसायिक नहीं थी, बल्कि यह दो देशों के बीच संतुलन और शांति की दिशा में सोच को भी दर्शाती थी।

बसु ने मीडिया से कहा था, “वो पुराने दिन थे जब हम साउथ अफ्रीका और इज़राइल की सरकारों का विरोध करते थे। लेकिन अब हमारी पॉलिसी बदल गई है। भारत की फॉरेन पॉलिसी भी बदल गई है और इन दोनों देशों के साथ पूरे डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं। मैं हमेशा इज़राइल से बहुत प्रभावित रहा हूँ। आखिर तीनों बड़े धर्म (यहूदी, ईसाई और इस्लाम) यहीं से निकले हैं।”

Israel में व्यापार और नवाचार पर ध्यान

बसु का दृष्टिकोण केवल कूटनीतिक नहीं था। उन्होंने इजरायल के किबुत्ज़ समुदायों और टेक्नोलॉजी हब का दौरा किया। किबुत्ज़ एक सामूहिक समाज और कम्युनिटेरियनिज़्म पर आधारित मॉडल है। बसु ने इसे देखा और कहा, “इजरायल कम्युनिज़्म के वर्किंग मॉडल का अकेला उदाहरण है।”

उनका यह कदम यह दिखाता है कि राजनीतिक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए भी व्यावहारिक लाभ और नवाचार पर ध्यान देना संभव है।

कम्युनिस्ट पार्टी और आलोचना

जब ज्योति बसु ने इजरायल यात्रा की, तब CPI और CPM के अंदर कुछ आलोचनाएँ हुईं। पार्टी का पारंपरिक रुख इजरायल के खिलाफ था। लेकिन ज्योति बसु ने इसे व्यावहारिक और बिजनेस डील के रूप में देखा।

उनके निर्णय से पश्चिम बंगाल की कंपनियों ने IT, इलेक्ट्रॉनिक्स और कृषि क्षेत्रों में इजरायल के साथ सहयोग की संभावनाओं पर विचार करना शुरू किया।

एम ए बेबी और मोदी के इजरायल दौरे पर लेफ्ट की प्रतिक्रिया

25 साल बाद, जब पीएम मोदी इजरायल दौरे पर हैं, लेफ्ट नेताओं ने इसे आलोचना का विषय बना दिया। एम ए बेबी ने ट्विटर/X पर लिखा:
“फ़िलिस्तीन पर लगातार नरसंहार करने वाले हमलों के बीच ज़ायोनिस्ट इज़रायल को मोदी का गले लगाना, भारत की एंटी-कॉलोनियल विरासत और फ़िलिस्तीनी लोगों के अधिकारों के सपोर्ट के खिलाफ है। यह नापाक गठबंधन हमारे देश की आत्मा पर कभी न मिटने वाला धब्बा होगा।”

एम ए बेबी ने इजरायल के प्रधानमंत्री को वॉर क्रिमिनल कहा और मोदी के दौरे को “शर्म की बात” बताया।

भारत और इजरायल के रिश्ते

भारत ने 17 सितंबर 1950 में इजरायल को मान्यता दी, लेकिन कूटनीतिक संबंध 1992 में पीएम नरसिम्हा राव के नेतृत्व में स्थापित किए गए। इसके छह साल बाद ही ज्योति बसु ने इजरायल के साथ संबंध बनाने का साहसिक कदम उठाया।

आज भारत और इजरायल के बीच रक्षा, व्यापार और आर्थिक सहयोग पर समझौते हो रहे हैं। मोदी के दौरे में भी यही मुख्य उद्देश्य है।

राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण

  • ज्योति बसु ने देखा कि इजरायल विज्ञान और नवाचार में आगे है।
  • उन्होंने राजनीतिक विचारधारा से हटकर व्यावहारिक और आर्थिक लाभ पर ध्यान दिया।
  • उनके निर्णय ने पश्चिम बंगाल और भारत के लिए व्यावसायिक और तकनीकी अवसर खोले।

वहीं, लेफ्ट का पुराना रुख अब भी कायम है और वर्तमान मोदी दौरे पर भी उन्होंने इजरायल विरोध जताया।

निष्कर्ष

ज्योति बसु की इजरायल यात्रा एक साहसिक और दूरदर्शी कदम थी। उन्होंने राजनीतिक टैबू को तोड़ा और व्यावहारिक लाभ, नवाचार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को महत्व दिया।

आज, जब पीएम मोदी इजरायल दौरे पर हैं, लेफ्ट नेताओं की आलोचना इस बात को दर्शाती है कि राजनीतिक विचारधारा और व्यावहारिक नीति के बीच संतुलन कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

बसु के कदम से यह सिखने को मिलता है कि राजनीति में साहस, दूरदर्शिता और व्यावहारिक दृष्टिकोण किसी भी निर्णय को सफल बना सकता है।

भारत में इजरायल और फिलिस्तीन के बीच संतुलन और कूटनीतिक समझ की दिशा में ज्योति बसु का निर्णय आज भी याद किया जाता है।

 

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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