स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार – मुनि प्रत्यक्षरत्न विजय के प्रेरक प्रवचन से जानिए 7 शक्तिशाली सूत्र जो आत्मशुद्धि, कषाय त्याग और परमात्मा प्राप्ति का मार्ग बताते हैं।
स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार: आध्यात्मिक जागरण का संदेश
भाटपचलाना (ब्रजेश बोहरा)।सौधर्म बृहत्तपोगच्छीय युगप्रभावक, पुण्यसम्राट गुरुदेव श्रीमद् विजय जयन्तसेन सूरीश्वरजी महाराजा के शिष्यरत्न द्विशतावधानी परमरस मुनिराज मुनि प्रत्यक्षरत्न विजय एवं मुनि पवित्ररत्न विजय भाटपचलाना श्रीसंघ में विराजमान हैं।अपने ओजस्वी प्रवचन में मुनि श्री ने स्पष्ट कहा — “स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार है।”उन्होंने समझाया कि जब तक मनुष्य अपने भीतर के कषाय—क्रोध, मान, माया और लोभ—को समाप्त नहीं करता, तब तक आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकती।
स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार – मूल संदेश
स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि संपूर्ण आध्यात्मिक साधना का सार है।मुनि प्रत्यक्षरत्न विजयजी ने कहा कि धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं है। सच्चा धर्म तब प्रारंभ होता है जब मनुष्य अपने स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है।यदि भीतर क्रोध है, अहंकार है, लोभ है—तो भले ही हम कितनी भी पूजा या तप करें, आत्मा निर्मल नहीं हो सकती।
कषाय: आत्मा के चार शत्रु
जैन दर्शन के अनुसार चार प्रमुख कषाय आत्मा को बांधते हैं:
- क्रोध
- मान
- माया
- लोभ
स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार तब बनती है जब इन चारों का क्षय होता है।मुनि श्री ने कहा कि कषाय आत्मा पर धूल की तरह हैं। जब तक यह धूल साफ नहीं होगी, तब तक आत्मा का तेज प्रकट नहीं होगा।
क्रियाकांड बनाम स्वभाव परिवर्तन
मुनि श्री ने कहा कि क्रियाकांड केवल साधन हैं, साध्य नहीं।यदि स्वभाव नहीं बदला तो त्याग भी प्रदर्शन बन जाता है।स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार इसीलिए कहा गया क्योंकि परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग भीतर से होकर जाता है, बाहर से नहीं।
विभाव से स्वभाव की ओर यात्रा
विभाव अर्थात विकार।स्वभाव अर्थात शुद्ध आत्मस्वरूप।जब मनुष्य विभाव का त्याग करता है, तब वह अपने मूल स्वभाव में स्थित होता है।यही आत्मविशुद्धि है।यही आध्यात्मिक उत्कर्ष है।और यही वह क्षण है जब स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार सिद्ध होती है।
युवाओं के लिए जागृति संदेश
रात्रिकालीन प्रवचनों में मुनि पवित्ररत्न विजयजी युवाओं को जीवन मूल्यों की शिक्षा दे रहे हैं।उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी यदि स्वभाव की शुद्धता को अपना ले, तो समाज स्वतः बदल जाएगा।धर्म केवल वृद्धावस्था का विषय नहीं, बल्कि युवावस्था की दिशा है।
नेमि जयन्तराज विहारधाम का भव्य उद्घाटन
26 फरवरी को भाटपचलाना से सकल जैन श्रीसंघ के साथ लगभग 10 किलोमीटर तक गाजे-बाजे के साथ नवीन “पुण्यसम्राट रथ” के संग खाचरौद मार्ग स्थित भूमि दानदाता श्री पंकज जैन के नेमीनाथ वेयरहाउस परिसर में निर्मित “नेमि जयन्तराज विहारधाम” का भव्य उद्घाटन होगा।विहारधाम का संचालन श्री आदिनाथ त्रिस्तुतिक जैन श्वेताम्बर ट्रस्ट द्वारा किया जाएगा।इस अवसर पर मुनि भगवंतों द्वारा निश्रा प्रदान की जाएगी।
निष्कर्ष: आत्मशुद्धि ही सच्चा धर्म
अंततः मुनि प्रत्यक्षरत्न विजयजी का संदेश स्पष्ट है:
“स्वभाव की निर्मलता ही परमात्मा का द्वार है।”
यदि मन शुद्ध है, तो जीवन शुद्ध है।यदि स्वभाव निर्मल है, तो आत्मा परमात्मा से जुड़ती है।धर्म का सार बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि भीतर के परिवर्तन में है।
