समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा के 22 वर्षों की सेवा पर मुंबई में भव्य आयोजन, आचार्य भगवंत ने 23वीं यात्रा का मुहूर्त दिया।
समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा — सेवा, श्रद्धा और समर्पण की अद्भुत परंपरा
प्रस्तावना
समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि करुणा, सेवा और मानवता का जीवंत उदाहरण है। पिछले 22 वर्षों से दिव्यांग भक्तों को श्री समेद शिखरजी के दर्शन कराने का जो पुण्य कार्य निरंतर चल रहा है, वह आज समाज के लिए प्रेरणा बन चुका है।
मुंबई में आयोजित एक विशेष समारोह में इस सेवा परंपरा को नई ऊर्जा मिली, जब परम पूज्य श्रीमद् विमल गच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री प्रद्युम्नविमल सुरिश्वरजी महाराजा साहेब के सानिध्य में 23वीं यात्रा का मुहूर्त प्रदान किया गया।
मुंबई में हुआ भव्य आयोजन
महाराष्ट्र की मायानगरी मुंबई के ताडदेव स्थित आदित्य हाईट्स में रानीवाड़ा निवासी कल्पेश कुमार भंवरलालजी वाणीगोता के निवास स्थान पर यह आध्यात्मिक आयोजन सम्पन्न हुआ।सुबह से ही भक्तों की कतारें लग गई थीं।पिछले 10 दिनों से मुंबई में भक्तों का जमावड़ा लगा हुआ था — जो इस आयोजन की महत्ता को दर्शाता है।
22 वर्षों की निरंतर सेवा का सम्मान
इस अवसर पर 22वीं समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा पर आधारित स्मारिका (बुक) का विमोचन आचार्य भगवंत के करकमलों से किया गया।
विमोचन में उपस्थित प्रमुख श्रद्धालु:
- प्रकाश जी ढालावत (मंडल प्रमुख)
- राजु भाई पालगोता
- विनोद भाई सुराणा
- के. विक्रम सुराणा
- एडवोकेट महेंद्र भाई रानी
- एडवोकेट हसमुख भाई वोरा
- कृष्णजी राजपुरोहित
- धुम्बड़िया, रोपसी, मेडा, जालजी, रावजी सहित अनेक श्रद्धालु
आचार्य भगवंत ने कहा:
“जो कार्य 22 वर्षों से दिव्यांग भक्तों को तीर्थ तक पहुंचाने का हो रहा है, वह साधारण सेवा नहीं — यह जीव दया का सर्वोच्च रूप है।”
23वीं समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा का मुहूर्त
आचार्य भगवंत ने आगामी
4 जनवरी 2027
को आयोजित होने वाली 23वीं समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा का शुभ मुहूर्त प्रदान किया।यह यात्रा मुंबई से प्रस्थान करेगी और पंच तीर्थों सहित आयोजित होगी।यह केवल यात्रा नहीं —श्रद्धा, सेवा और समावेश का आंदोलन है।
दिव्यांग भक्तों के लिए प्रेरणादायी पहल
समेद शिखरजी पर्वत, जिसे जैन धर्म का मोक्षभूमि तीर्थ कहा जाता है, वहाँ की चढ़ाई अत्यंत कठिन मानी जाती है। ऐसे में दिव्यांग भक्तों को दर्शन करवाना असाधारण सेवा है।
प्रकाश जी ढालावत और उनका समूह:
- विशेष व्यवस्थाएँ करता है
- चिकित्सा सहयोग उपलब्ध कराता है
- यात्रा को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाता है
- दिव्यांगों को “यात्री” नहीं, “श्रद्धालु” का सम्मान देता है
यह समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा समाज में संवेदनशीलता का उदाहरण बन चुकी है।
आचार्य भगवंत का संदेश
आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा:
- तीर्थ केवल पहुँचने से नहीं, भावना से मिलते हैं
- सेवा ही धर्म की सबसे बड़ी साधना है
- दिव्यांगों को तीर्थ तक पहुँचाना — आत्मकल्याण का मार्ग है
उन्होंने सभी भक्तों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
समाज की भागीदारी और गुरुभक्ति
राजु भाई सुराणा ने कहा:“ऐसे सरल, वचन सिद्ध आचार्य भगवंत के दर्शन हेतु छत्तीस कौम का एकत्र होना, गुरुभक्ति का अद्भुत प्रमाण है।”यह आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समुदाय की एकता का उत्सव बन गया।
यात्रा का आध्यात्मिक महत्व
समेद शिखरजी जैन धर्म का सर्वोच्च तीर्थ है, जहाँ:
- 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया
- यह मुक्ति का पर्वत माना जाता है
- यहाँ की यात्रा आत्मशुद्धि का मार्ग मानी जाती है
दिव्यांग श्रद्धालुओं के लिए यह यात्राजीवन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक अनुभव बन जाती है।
निष्कर्ष — सेवा ही सच्ची साधना
समेद शिखरजी दिव्यांग यात्रा ने यह सिद्ध कर दिया है कि धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि सेवा का नाम है।22 वर्षों से चल रही यह परंपरा अब 23वें वर्ष में प्रवेश कर रही है —और यह यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।यह आयोजन हमें याद दिलाता है:जहाँ करुणा है, वहीं धर्म है।जहाँ सेवा है, वहीं तीर्थ है।



