मरणोपरांत नेत्रदान नागदा में गगरानी परिवार ने मानवता की मिसाल पेश की। 936वें नेत्रदान से दो नेत्रहीनों को नई रोशनी मिलने की उम्मीद।
मरणोपरांत नेत्रदान नागदा की प्रेरक घटना
नागदा नगर में मरणोपरांत नेत्रदान नागदा की एक अत्यंत प्रेरक घटना सामने आई है, जिसने मानवता, सेवा और संवेदनशीलता का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। नगर के प्रतिष्ठित गगरानी परिवार ने स्वर्गीय श्री कालूराम गगरानी के निधन के पश्चात उनके नेत्रदान का निर्णय लेकर समाज को एक गहरा संदेश दिया—
जीवन समाप्त होता है, लेकिन रोशनी आगे बढ़ाई जा सकती है।
गगरानी परिवार का संवेदनशील निर्णय
शोक की घड़ी में अक्सर परिवार स्वयं को संभालना भी कठिन समझता है, लेकिन अशोक, आनंदी एवं राजेश गगरानी ने व्यक्तिगत दुःख से ऊपर उठकर समाजहित को प्राथमिकता दी।
यह निर्णय केवल एक धार्मिक कर्म नहीं था, बल्कि
मानवता के प्रति उत्तरदायित्व का जीवंत उदाहरण था।
ऐसे निर्णय समाज में करुणा की संस्कृति को मजबूत करते हैं।
936वाँ नेत्रदान — सेवा का लंबा इतिहास
गीता भवन न्यास समिति, बड़नगर की टीम ने डॉ. जी.एल. ददरवाल के मार्गदर्शन में संपूर्ण विधिक प्रक्रिया पूर्ण की।
यह संस्था द्वारा सम्पन्न किया गया 936वाँ नेत्रदान है।
यह आँकड़ा केवल संख्या नहीं है —
यह दशकों से चल रही निःस्वार्थ सेवा का प्रमाण है।
जैन सोशल ग्रुप नागदा की महत्वपूर्ण भूमिका
इस पुनीत कार्य में जैन सोशल ग्रुप नागदा के नेत्रदान प्रभारी ब्रजेश बोहरा ने सक्रिय समन्वय किया।
उनके प्रयासों से यह नगर का 55वाँ नेत्रदान सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
समय पर की गई कार्रवाई से दो नेत्रहीन व्यक्तियों को दृष्टि मिलने की संभावना बनी है।
नेत्रदान क्यों है महादान?
भारत में लाखों लोग कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से पीड़ित हैं।
नेत्रदान से—
- दो व्यक्तियों को दृष्टि मिल सकती है
- मृत्यु के बाद भी जीवन का अर्थ बना रहता है
- यह सबसे सरल और प्रभावी दान है
- किसी धर्म में इसका निषेध नहीं है
- परिवार को भी आत्मिक संतोष मिलता है
इसलिए इसे “महादान” कहा जाता है।
समाज के लिए प्रेरणा बनती ऐसी घटनाएँ
मरणोपरांत नेत्रदान नागदा जैसी घटनाएँ समाज में सकारात्मक बदलाव लाती हैं।
जब प्रतिष्ठित परिवार आगे आते हैं—
- जागरूकता बढ़ती है
- लोग संकोच छोड़ते हैं
- नई पीढ़ी सेवा का महत्व समझती है
- मृत्यु को भी अर्थपूर्ण बनाने की प्रेरणा मिलती है
नेत्रदान प्रक्रिया कैसे होती है?
नेत्रदान एक अत्यंत सरल चिकित्सा प्रक्रिया है:
- मृत्यु के 4–6 घंटे के भीतर टीम को सूचना दी जाती है
- विशेषज्ञ डॉक्टर घर या अस्पताल पहुँचते हैं
- कॉर्निया सुरक्षित रूप से लिया जाता है
- शरीर की संरचना प्रभावित नहीं होती
- अंतिम संस्कार में कोई बाधा नहीं आती
पूरी प्रक्रिया मात्र 20–25 मिनट में पूर्ण हो जाती है।
नेत्रदान से जुड़ी भ्रांतियाँ और सत्य
| भ्रांति | सत्य |
|---|---|
| चेहरा खराब हो जाता है | बिल्कुल नहीं |
| धार्मिक रूप से वर्जित है | सभी धर्म समर्थन करते हैं |
| बुजुर्ग नेत्रदान नहीं कर सकते | उम्र बाधा नहीं |
| परिवार को खर्च करना पड़ता है | पूरी प्रक्रिया निःशुल्क |
कैसे लें नेत्रदान का संकल्प
यदि आप भी नेत्रदान करना चाहते हैं:
- अपने परिवार को अपनी इच्छा बताएं
- नेत्रदान प्रतिज्ञा फॉर्म भरें
- स्थानीय नेत्र बैंक से जुड़ें
- मृत्यु के बाद परिवार की सहमति सबसे महत्वपूर्ण होती है
जागरूकता ही सबसे बड़ी शुरुआत है।
श्रद्धांजलि एवं संवेदना
गीता भवन न्यास समिति के अध्यक्ष धर्मेन्द्र बम एवं जैन सोशल ग्रुप नागदा के सक्रिय सदस्य सीए कमलनयन चपलोत ने दिवंगत आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और शोकाकुल परिवार के प्रति गहन संवेदना व्यक्त की।
निष्कर्ष: मृत्यु के बाद भी जीवन बाँटने की परंपरा
मरणोपरांत नेत्रदान नागदा केवल एक समाचार नहीं —
यह संवेदनशील समाज की पहचान है।
स्व. श्री कालूराम गगरानी का यह निर्णय आने वाले वर्षों तक लोगों को प्रेरित करता रहेगा कि—
“असली विरासत संपत्ति नहीं, बल्कि मानवता होती है।”
जब एक व्यक्ति नेत्रदान करता है,
तो वह मृत्यु के बाद भी दो जीवनों में सूर्योदय कर देता है।


