तृतीय पुण्य स्मृति दिवस – डॉ. संजीव जी गोधा
Jabalpur News :तृतीय पुण्य स्मृति दिवस एक ऐसा अवसर है जब हम महान आत्मा डॉ. संजीव जी गोधा के जीवन, उपदेश और योगदान को याद करते हैं। उनके द्वारा समाज को दी गई शिक्षाएं केवल धार्मिक या नैतिक मूल्यों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने अपने जीवन द्वारा यह दिखाया कि कैसे सत्य, धर्म और आत्मा की शुद्धता के मार्ग पर चलकर व्यक्ति अपने जीवन को अमर बना सकता है। डॉ. संजीव जी गोधा ने अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना किया, लेकिन कभी भी सत्य और न्याय का मार्ग नहीं छोड़ा।
छले जाने का अनुभव
जीवन के अनुभवों में अक्सर ऐसा होता है कि हम उम्मीद करते हैं कि हमारे अच्छे कर्मों और प्रयासों की सही पहचान होगी। लेकिन कभी-कभी हम छले भी जाते हैं। डॉ. संजीव जी गोधा के अनुयायियों के मन में यह विचार अक्सर आता है कि “किससे अब मैं क्या कहूं, फिर से हम छले गए। बाट जोहते रहे हम, तुम तो यूं चले गए।” यह पंक्ति दर्शाती है कि उनके अनुयायी, मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में, उनके शब्दों और शिक्षाओं के मार्गदर्शन को खोजते रहे, और अंततः उनके जीवन का अनुभव उन्हें मार्गदर्शन के रूप में प्राप्त हुआ।
सत्य और न्याय का संदेश
डॉ. संजीव जी गोधा ने अपने जीवन में हमेशा सत्य का पालन किया। उन्होंने मिथ्यात्व और छल पर प्रहार किया और सत्य के पक्ष में खड़े रहे। उनके उपदेशों और कर्मों ने यह स्पष्ट किया कि जीवन में केवल सत्य का प्रचार करना ही व्यक्ति को अमरत्व की ओर ले जा सकता है। उनके अनुयायियों ने अनुभव किया कि “तुम तो मर के जी गए, हम तो जी के मर रहे।” यह दर्शाता है कि डॉ. संजीव जी ने अपने जीवन में ऐसे सिद्धांत स्थापित किए, जो मृत्यु के बाद भी जीवित हैं और उनके अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक बन गए हैं।
हाव-भाव और शब्दों की कशिश
उनकी व्यक्तित्व में एक अजीब आकर्षण था। उनका हाव-भाव, उनका मौन, उनके शब्द और उनकी वाणी—सब कुछ इतनी गहराई से प्रेरणादायक था कि वे स्वयं में मौन और वाचाल दोनों थे। “शब्द सारे मौन हैं, वे स्वयं नि:शब्द हैं। वाचाल भी तो मौन है, मौन भी मुखर हुए।” यह दर्शाता है कि उनकी उपस्थिति और उनके विचारों का प्रभाव इतना गहरा था कि उनके शब्दों की तुलना में उनका मौन भी लोगों को जीवन के मार्ग पर प्रेरित करता था।
अमर स्मृति
डॉ. संजीव जी गोधा का सौम्य वदन और उनके व्यक्तित्व का आकर्षण कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका जीवन और उनके द्वारा दी गई शिक्षाएं अमर हैं। उनके अनुयायी कहते हैं, “आत्म तत्व ही सहाय, तुम सिखा अमर भये।” उनका मार्गदर्शन और उदाहरण हमेशा स्मरणीय रहेगा। उनके जाने के बाद भी उनकी शिक्षाएं जीवन की कठिनाइयों में दीपक की तरह उजाला करती हैं।
मृत्यु और जीवन का उपदेश
डॉ. संजीव जी ने जीवन और मृत्यु दोनों को जीने की कला सिखाई। उन्होंने यह दिखाया कि मृत्यु का भय केवल मानसिक है, और मृत्यु से डरकर जीवन को अधूरा नहीं जीना चाहिए। “मौत देख डर गई, क्या अजब ये जीव है। मृत्यु देख कह उठी, यह तो संजीव है। जीना भी सिखा गए, मरना भी बता गए।” उनके जीवन और शिक्षाओं में यह स्पष्ट होता है कि मृत्यु के भय को पार करना और जीवन को पूर्ण रूप से जीना ही सच्ची साधना है।
समय और संयोग की सच्चाई
वे हमें यह भी सिखाते हैं कि समय और संयोग का प्रभाव जीवन पर अनिवार्य है, और इसके सामने कोई स्थायी नहीं है। “काल की ये क्रूरता प्रत्येक पल जगा रही। संयोग की असारता सामने दिखा रही। कौन कहता मर गए, मरके वे अमर भये।” इसका अर्थ यह है कि भौतिक रूप से व्यक्ति के जाने के बाद भी उसके उपदेश और कर्म अमर रहते हैं।
मोह और अट्टहास
डॉ. संजीव जी ने मोह, राग और द्वेष के जाल में फंसने से हमेशा परहेज किया। उन्होंने दिखाया कि सच्चा आत्मा-विज्ञानी इन भावनाओं के प्रभाव में नहीं आता। “अट्टहास मृत्यु का देखकर डरे नहीं, मोह राग द्वेष कीच में भी तुम पड़े नहीं। काल भी नमन करे स्वयं में वे चले गए।” उनके इस दृष्टिकोण ने अनुयायियों को भी सिखाया कि जीवन में स्थायी मूल्यों के लिए अडिग रहना ही सर्वोत्तम साधना है।
शिक्षा और मार्गदर्शन
डॉ. संजीव जी गोधा ने न केवल जीवन जीना सिखाया, बल्कि यह भी बताया कि किस प्रकार व्यक्ति अपने ज्ञान और कर्म से समाज में योगदान कर सकता है। “मैं हूं सिद्ध वंश का भूल मैं भटक रहा। देह-भोग और संयोग मोह में अटक रहा। तुम तो सीख कर गए, हमें भी सिखा गए।” उनका संदेश यह था कि अपने अंदर की शुद्धता को पहचानें और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सजग रहें।
अंततः सत्य की अनुभूति
वे हमें यह भी याद दिलाते हैं कि सही संगति और संयोग का चयन बहुत महत्वपूर्ण है। “जिनको संग समझ रहे थे, वे स्वयं असंग थे। संयोग सारे नि:सहाय, सामने प्रसंग है ये। अपने में ही यूं रमे, यूं कभी रमे नहीं।” इस पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि जीवन में हमें सत्पुरुषों का संग लेना चाहिए और केवल उन लोगों के प्रभाव में रहना चाहिए जो हमारे आत्मिक विकास में सहायक हों।
समापन
डॉ. संजीव जी गोधा का जीवन, उनके उपदेश और उनकी शिक्षाएं हमें जीवन में स्थिरता, सत्य और धर्म की ओर मार्गदर्शन करती हैं। उनके द्वारा दिखाया गया मार्ग हमें कठिनाइयों में भी सही निर्णय लेने और सत्य का पालन करने की प्रेरणा देता है। इस तृतीय पुण्य स्मृति दिवस पर, हम उनके आदर्शों और शिक्षाओं को स्मरण करते हुए अपने जीवन में उनका पालन करने का संकल्प लेते हैं।
उनकी अमर स्मृति और शिक्षाएं हमें यह याद दिलाती हैं कि मृत्यु केवल शारीरिक है, लेकिन सत्य, धर्म और आत्मा की चेतना हमेशा अमर रहती है।
