जैन समाज को आक्रमणकारी कहना अस्वीकार्य। मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर विश्व जैन संगठन, मयंक जैन और राजेश जैन दद्दू ने कड़ा विरोध दर्ज किया।
राजेश जैन दद्दू
जैन समाज को आक्रमणकारी कहना: क्यों भड़का देशभर का जैन समाज
जैन समाज को आक्रमणकारी कहना न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है, बल्कि यह भारत की प्राचीनतम अहिंसक संस्कृति का सीधा अपमान भी है।
मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ द्वारा दिए गए हालिया निर्णय (मुकदमा संख्या 3188/2025) में प्रयुक्त शब्दों ने पूरे देश में जैन समाज को झकझोर दिया है।
यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत अपनी सनातन और मूल सभ्यताओं को विश्व पटल पर स्थापित कर रहा है।
मद्रास हाईकोर्ट का फैसला और विवादित शब्दावली
16 जनवरी 2026 को आए 170 पन्नों के फैसले के बिंदु क्रमांक 8 में जैन समुदाय को
“प्रचारक या आक्रमणकारी (Invaders)” कहे जाने पर कड़ा विरोध सामने आया।
यह शब्द न केवल असंवेदनशील हैं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों से भी परे हैं।
विश्व जैन संगठन और राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ की कड़ी प्रतिक्रिया
विश्व जैन संगठन (इंदौर) और राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने इस टिप्पणी को
“जैन इतिहास पर क्रूर मजाक” बताया है।
राजेश जैन दद्दू का बयान:
“जिस संस्कृति के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम पर इस देश का नाम ‘भारत’ पड़ा, उसे बाहरी कहना हास्यास्पद है।”
जैन इतिहास: आक्रमणकारी नहीं, बल्कि पीड़ित रहा समाज
जैन समाज को आक्रमणकारी कहना इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में से एक है।
ऐतिहासिक तथ्य:
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8वीं–9वीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जैन मुनियों का नरसंहार
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जैन ग्रंथों और बसाड़ियों का विध्वंस
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अहिंसा के कारण आत्मरक्षा तक न करना
मयंक जैन का कथन:
“हम आक्रमणकारी नहीं, पीड़ित रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं से ऐसी गैर-जिम्मेदार टिप्पणी अपेक्षित नहीं।”
भगवान ऋषभदेव और ‘भारत’ नाम का ऐतिहासिक आधार
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प्रथम तीर्थंकर: भगवान ऋषभदेव
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पुत्र: चक्रवर्ती भरत
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भारतवर्ष का नामकरण
यह तथ्य पुराणों, जैन आगमों और इतिहासकारों द्वारा प्रमाणित है।
प्रमुख मांगें: न्याय, सुधार और सम्मान
आपत्तिजनक टिप्पणी हटाई जाए
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जैन समाज से राष्ट्रीय आह्वान
विश्व जैन संगठन और राष्ट्रीय जिनशासन एकता संघ ने देशभर की जैन संस्थाओं से आग्रह किया:
“अहिंसक होना कायर होना नहीं है।”
यदि आज विरोध नहीं किया गया, तो
आने वाली पीढ़ियां हमें अपराधी समझेंगी।
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