संयमी जीवन की प्रेरणा: निखिलशीलाजी का 54वां जन्मदिन थांदला संघ में
थांदला संघ में हाल ही में पूज्याश्री निखिलशीलाजी म.सा. के 54वें जन्मदिन का भव्य आयोजन हुआ। यह अवसर न केवल उनके संयमित और तपशील जीवन का सम्मान करने का था, बल्कि संघ और समाज के प्रत्येक सदस्य को आध्यात्मिक अनुशासन और साधना की प्रेरणा देने का भी माध्यम बना। समारोह में साध्वी के अनुयायी, महिला मंडल और संघ के विभिन्न सदस्य उपस्थित रहे और सामूहिक आराधना के माध्यम से उनके जीवन को श्रद्धांजलि दी।
संतों और संयमी आत्माओं के जन्मदिन का आध्यात्मिक महत्व
जैन परंपरा में साधु-संतों और स्थविरा महात्माओं के जन्मदिन मनाने की परंपरा नहीं रही है, क्योंकि उनका जीवन त्याग और सांसारिक मोह-ममता से परे रहता है। फिर भी, विशेष अवसर जैसे दीक्षा दिवस, अवतरण दिवस, या किसी महापुरुष के जीवन की महत्वपूर्ण तिथियाँ, संघ में आराधना और भक्ति के अवसर के रूप में मनाए जाते रहे हैं।
पूज्याश्री धर्मदासगण नायक एवं पूज्याश्री उमेशमुनिजी म.सा. के अनुसार, इस प्रकार के आयोजन का उद्देश्य केवल साध्वी के सम्मान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि साधक वर्ग को भी धर्म और साधना में सहभागी बनाने का अवसर होना चाहिए। थांदला संघ पिछले आठ वर्षों से इस परंपरा का पालन कर रहा है।
54वें जन्मदिन पर आयोजित विशेष कार्यक्रम
इस अवसर पर स्थानीय संघ परिसर में बड़ी संख्या में अनुयायी और श्रद्धालु उपस्थित हुए। महिला मंडल के आह्वान पर पांच सामयिक की विशेष आराधना भी संपन्न हुई। यह आयोजन साध्वी के जीवन और तप की महिमा को प्रदर्शित करने के साथ-साथ सामूहिक साधना और अनुशासन का अवसर भी बना।
आराधना के बाद ज्ञातधर्म कथा वाचन हुआ, जिसमें पूज्याश्री निखिलशीलाजी के संयम, तप और साधना के मार्ग पर जीवन के आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किए गए।
भरत भंसाली का संदेश: संयमी जीवन से समाज की सुरक्षा
सभा को संबोधित करते हुए भरत भंसाली, पूज्याश्री धर्मदास गण परिषद के पूर्व अध्यक्ष, ने कहा कि आज का समाज विभिन्न प्रकार की भौतिक और नैतिक चुनौतियों से घिरा हुआ है। महिलाओं में मोबाइल और सोशल इवेंट्स का बढ़ता प्रभाव, व्यापारियों में अनैतिक धन अर्जन की प्रवृत्ति और युवाओं में व्यसनों की बढ़ती संख्या जैसी परिस्थितियों में, सामाजिक सुरक्षा और नैतिक स्थिरता केवल संयमी आत्माओं की साधना और तप से ही संभव है।
उन्होंने यह भी कहा कि नगर में माताजी महासती और अन्य स्थविरा महात्माओं के पुण्य प्रताप के कारण आज संघ में धर्म आराधना सक्रिय रूप से होती है और यह समाज के संस्कारों में वृद्धि का कारण बनता है।
पूज्याश्री निखिलशीलाजी के जीवन का महत्त्व
पूज्याश्री निखिलशीलाजी पिछले 32 वर्षों से सतत संयम और तपशील जीवन जी रही हैं। उनका जीवन पुष्प में पराग, कोयल में हीरा और समुद्र में मोती की तरह प्रतीकात्मक है—साधना और तप के माध्यम से उनके भीतर ईश्वरत्व का दर्शन होता है।
संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया ने कहा कि निखिलशीलाजी के विराजने से संघ में धर्म आराधना के अवसर और सुपात्रदान का मार्ग प्रशस्त हुआ है। सचिव हितेश शाह ने संघ के सभी सदस्यों से आग्रह किया कि वे साध्वी द्वारा प्रवाहित धर्मज्ञान की गंगा में डुबकी लगाएँ और इसे अपने जीवन में आगे बढ़ाएँ।
प्रवक्ता पवन नाहर ने जन्मदिन के अवसर को संघ के लिए शुभ और मंगलकारी बताते हुए कहा कि संयम और तप का पालन करने वाली साध्वी का जीवन सभी के लिए प्रेरणा है।
महिला मंडल और अनुष्ठान
अणु आराधना मंडल की महिलाओं ने विशेष स्तवन और पूजा के माध्यम से पूज्याश्री के उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। साध्वी ने भी अपने संबोधन में कहा कि जैनाचार्य पूज्य गुरूदेव उमेशमुनिजी और वर्तमान गण नायक बुद्धपुत्र प्रवर्तक देव पूज्य श्री जिनेन्द्रमुनिजी की स्पष्ट आज्ञा है कि साध्वी अपने जन्मदिन आदि व्यक्तिगत प्रसंग नहीं मनाएं। फिर भी संघ ने धर्माराधना का आयोजन कर साधक वर्ग को लाभान्वित किया।
इस अवसर पर साध्वी ने सभी को एक वर्ष तक फव्वारों या टब स्वीमिंग पूल में न नहाने का प्रत्याख्यान भी दिया, जो उनके तप और संयम का प्रतीक है।
पक्खी पर्व और सामूहिक उपवास
जन्मदिन से एक दिन पूर्व पक्खी पर्व पर 70 आराधकों ने सामूहिक उपवास और तप की आराधना की। इस उपवास का पारण नवकार मंत्र के सामूहिक जाप के बाद स्थानीय महावीर भवन पर हुआ, जिसका लाभ संजय सुरेशचंद्र चौधरी परिवार ने ग्रहण किया।
थांदला पक्खी मंडल माह में दो बार सामूहिक उपवास की परंपरा का पालन करता है। इसमें कुछ आराधक परिपूर्ण संयम, देश पौषध और संवर का पालन करते हुए एक दिन साधु जैसा जीवन जीने का प्रयास करते हैं। संघ द्वारा आने वाले अधिवेशनों में इन वार्षिक आराधकों का सम्मान भी किया जाएगा।
निष्कर्ष: धर्म और संयम से प्रेरित समाज
थांदला संघ में पूज्याश्री निखिलशीलाजी के जन्मदिन का यह आयोजन यह संदेश देता है कि संयमी और तपशील जीवन केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्थान के लिए प्रेरणा है।
साधना, सामूहिक पूजा, उपवास और धर्मसभा के माध्यम से समुदाय नैतिकता, अनुशासन और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा देता है। संघ के सदस्यों के लिए यह अवसर अपने जीवन में धर्म ज्ञान और संयम का अभ्यास करने की प्रेरणा बनता है।
- पूज्याश्री निखिलशीलाजी का जीवन दर्शाता है कि गुरु आज्ञा में समर्पित जीवन, तप, संयम और सेवा ही सच्ची साध्वी की पहचान है और यह पीढ़ियों तक समाज को धर्म और संयम की ओर मार्गदर्शन करता रहेगा।
