नेत्रदान से अमर हुई मानवता: Rathore परिवार ने रचा सेवा का इतिहास
मरणोपरांत नेत्रदान से दो नेत्रहीनों को मिलेगी रोशनी
Nagda – राजा जन्मजेय की नगरी नागदा में Rathore परिवार ने मानवता की एक अद्वितीय मिसाल पेश की है। आदर्श गांधी ग्राम कॉलोनी निवासी दीपक भागीरथ प्रसाद राठौर की 67 वर्षीय माताजी, स्वर्गीय श्रीमती कलावती राठौर का 31 जनवरी की प्रातः 6 बजे मरणोपरांत नेत्रदान किया गया। इस पुण्य कार्य के माध्यम से दो नेत्रहीनों को रोशनी पाने की संभावना जगी है।
शोकाकुल परिजनों की सहमति से यह मानवता का कार्य गीता भवन न्यास समिति, बड़नगर के नेत्रदान प्रभारी डॉ. जी. एल. ददरवाल के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ। इस प्रक्रिया में मनीष तलाच एवं परमानंद पंवार ने विधिवत रूप से नेत्रदान क्रमांक 922 को पूरा किया।
Rathore परिवार का प्रेरक कदम
jain सोशल ग्रुप नागदा के नेत्रदान प्रभारी ब्रजेश बोहरा ने बताया कि सचिन दुबे की सूचना मिलने पर राठौर परिवार ने तुरंत सहमति दी और ग्रुप के सहयोग से नागदा में यह 54वां नेत्रदान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
उन्होंने बताया कि समय पर की गई त्वरित कार्रवाई से दो दृष्टिहीनों को नई रोशनी मिलने की उम्मीद जग गई। यह कदम समाज के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गया और राठौर परिवार के मानवीय दृष्टिकोण को उजागर करता है।
समाज ने परिवार को दी सराहना
jain सोशल ग्रुप नागदा के अध्यक्ष धर्मेन्द्र बम ने राठौर परिवार के इस सराहनीय निर्णय की भूरी-भूरी प्रशंसा की और नेत्रदानी पुण्यात्मा को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।
डॉ. जी. एल. ददरवाल ने भी स्वर्गीय श्रीमती राठौर को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए परिजनों के इस मानवीय निर्णय को समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया। समिति की ओर से परिवारजनों को प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किया गया।
गीता भवन न्यास समिति का योगदान
उल्लेखनीय है कि गीता भवन न्यास समिति, बड़नगर द्वारा लगभग 40 सेवाभावी प्रकल्प निःशुल्क संचालित किए जा रहे हैं। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन वितरण और अन्य सामाजिक कल्याण के कार्य शामिल हैं।
इस पुण्य अवसर पर राठौर परिवार ने न केवल नेत्रदान के माध्यम से मानवता की सेवा की, बल्कि दरिद्र नारायणों को एक दिन का भोजन कराने का भी पुण्य लाभ लिया। इस प्रकार परिवार ने समाज सेवा के दोहरे पहलुओं को पूर्ण किया – दृष्टिहीनों को रोशनी और जरूरतमंदों को भोजन।
नेत्रदान: समाज में मानवता की मिसाल
नेत्रदान केवल एक शारीरिक अंग देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मानवता, करुणा और समाज सेवा का प्रतीक है। राठौर परिवार के इस कदम से यह संदेश गया कि जीवन समाप्त होने के बाद भी कोई इंसान समाज में अमर योगदान दे सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे सामाजिक कार्यों से न केवल जरूरतमंद लाभान्वित होते हैं, बल्कि समाज में सकारात्मक संस्कार और सहयोग की भावना भी बढ़ती है।
नागदा में मानवता का संदेश
राठौर परिवार की इस पहल ने नागदा के नागरिकों को भी प्रेरित किया है। लोगों ने इस कार्य की सराहना करते हुए कहा कि असली पुण्य वही है, जो दूसरों की जिंदगी रोशन करे।
जैन सोशल ग्रुप नागदा ने भी इस अवसर पर कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के सहयोग की सराहना की। समय पर की गई कार्रवाई और सहयोग ने इसे और प्रभावशाली बनाया।
निष्कर्ष
स्वर्गीय श्रीमती कलावती राठौर के मरणोपरांत नेत्रदान ने दिखा दिया कि मानवता और सेवा की कोई उम्र या सीमा नहीं होती। राठौर परिवार ने अपने निर्णय से समाज को प्रेरणा दी और यह संदेश फैलाया कि जीवन के अंत के बाद भी मानवता अमर हो सकती है।
नेत्रदान के साथ-साथ भूखों को भोजन देना और समाज सेवा में योगदान देना, इस परिवार को आदर्श बनाता है। ऐसे कदम समाज में एक नई चेतना और सेवा की भावना उत्पन्न करते हैं।
Rathore परिवार का यह उदाहरण न केवल नागदा बल्कि पूरे प्रदेश के लिए मानवता और सेवा का प्रेरणास्त्रोत बन गया है।

Comments are closed.