सामाजिक संसद अध्यक्ष चुनने का अधिकार सिर्फ सांसदों को होना चाहिए। जानिए दिगंबर जैन समाज में अध्यक्ष चयन विवाद का संवैधानिक विश्लेषण।
डॉ जैनेन्द्र जैन
इंदौर
सामाजिक संसद अध्यक्ष चुनने का अधिकार सिर्फ सांसदों को
सामाजिक संसद अध्यक्ष चुनने का अधिकार सिर्फ सांसदों को — यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि दिगंबर जैन समाज की लोकतांत्रिक आत्मा की रक्षा का प्रश्न है। समाज के भीतर हाल के घटनाक्रमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि संवैधानिक प्रक्रियाओं की अनदेखी हुई, तो उसका सीधा प्रभाव समाज की एकता और गरिमा पर पड़ेगा।
जैन समाज की नैतिक पहचान
जैन समाज को सदैव नैतिक शुचिता, अनुशासन और चरित्र की कसौटी पर परखा गया है। यह समाज कभी संख्या से नहीं, बल्कि संस्कारों और सिद्धांतों से पहचाना गया है। किंतु आज जिस प्रकार राजनीति की विकृतियाँ समाज में प्रवेश करती दिख रही हैं, वह गहरी चिंता का विषय है।
सामाजिक संसद और लोकतांत्रिक परंपरा
सामाजिक संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जैन समाज की सर्वोच्च प्रतिनिधि व्यवस्था है, जहाँ जिनालय प्रतिनिधि (सांसद) समाज की आवाज़ होते हैं।
परंपरागत रूप से —
➡ अध्यक्ष का चयन
➡ साधारण सभा में
➡ सांसदों द्वारा
➡ लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया से
किया जाता रहा है।
दो अध्यक्षों की समस्या और समाधान की पहल
पिछले कुछ वर्षों से सामाजिक संसद में दो अध्यक्षों की स्थिति बनी हुई थी। समाज के जागरूक वर्ग ने “एक समाज, एक संसद और एक अध्यक्ष” की माँग उठाई — जो पूर्णतः उचित थी।
इसी उद्देश्य से दोनों अध्यक्षों की सहमति से एक समन्वय समिति का गठन किया गया।
समन्वय समिति का गठन और उद्देश्य
समन्वय समिति का उद्देश्य स्पष्ट था —
- मतदाता सूची का शुद्धिकरण
- संविधान सम्मत प्रक्रिया
- साधारण सभा का आयोजन
- लोकतांत्रिक चुनाव
संयोजक श्री कैलाशजी वैद द्वारा लिखित सुझाव प्रस्तुत किए गए, जिनका मूल आधार यही था कि —
सामाजिक संसद अध्यक्ष चुनने का अधिकार सिर्फ सांसदों को है।
संविधान सम्मत सुझावों की अनदेखी
दुर्भाग्यवश, समिति द्वारा स्वयं बनाए गए नियमों का उल्लंघन किया गया।
पहले यह तय हुआ था कि —
कोई भी समिति सदस्य चुनाव नहीं लड़ेगा
कोई अध्यक्ष घोषित नहीं करेगा
इसके बावजूद, असंवैधानिक और ताबड़तोड़ प्रक्रिया के तहत अध्यक्ष की घोषणा कर दी गई।
असंवैधानिक अध्यक्ष घोषणा पर आपत्ति
यह विरोध किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है।
यह विरोध है —
- संविधान की उपेक्षा का
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अवहेलना का
- सांसदों के अधिकारों के हनन का
जब सामाजिक संसद अध्यक्ष चुनने का अधिकार सिर्फ सांसदों को है, तो किसी समिति को यह अधिकार कैसे प्राप्त हो सकता है?
सांसदों के अधिकारों का हनन
इस पूरी प्रक्रिया से सांसद प्रतिनिधियों में गहरा असंतोष है।
क्योंकि —
➡ सांसद ही समाज की वास्तविक आवाज़ हैं
➡ उन्हीं से अध्यक्ष को वैधता मिलती है
➡ बिना चुनाव अध्यक्ष समाज को विभाजित करता है
विशेष साधारण सभा का महत्व
यदि लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई जाती, तो
एकता स्थापित होती
विरोध की आवश्यकता नहीं पड़ती
समाज मजबूत होता
इसीलिए 1 फरवरी, रविवार, दोपहर 2:00 बजे,
📍 महावीर बाग, कीर्ति स्तंभ
में आयोजित विशेष साधारण सभा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समाज से विनम्र अपील
मैं समाज के श्रेष्ठीजनों और सांसद प्रतिनिधियों से निवेदन करता हूँ —
सोचें कि जो हुआ, क्या वह
न्यायसंगत था
संवैधानिक था
समाज के हित में था
यदि नहीं, तो अपनी उपस्थिति और आवाज़ से लोकतंत्र की रक्षा करें।
निष्कर्ष
अंत में, यही कहना उचित होगा कि
👉 सामाजिक संसद अध्यक्ष चुनने का अधिकार सिर्फ सांसदों को
और इस अधिकार की रक्षा करना हर जागरूक जैन की जिम्मेदारी है।
यदि मेरे शब्दों से किसी की भावनाएँ आहत हुई हों, तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।
— डॉ. जैनेंद्र जैन
पूर्व मंत्री, दिगंबर जैन समाज सामाजिक संसद, इंदौर
