प्रमोशन में आरक्षण पर HC की अहम सुनवाई पूरी, सरकार से एक हफ्ते में मांगा जवाब
मध्य प्रदेश में पदोन्नति (प्रमोशन) में आरक्षण को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वर्षों से कानूनी पेचदगियों में उलझा यह मामला अब निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। जबलपुर HC में इस मुद्दे पर लगातार सुनवाई चल रही थी, जिसे अब पूरा कर लिया गया है। कोर्ट ने सपाक्स और अजाक्स—दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार से कई अहम सवालों के जवाब एक सप्ताह के भीतर दाखिल करने को कहा है। अगली सुनवाई की तारीख 3 फरवरी तय की गई है।
क्या है पूरा मामला?
मध्य प्रदेश में शासकीय सेवाओं में पदोन्नति के दौरान आरक्षण की व्यवस्था लंबे समय से विवादों में रही है। इस मुद्दे पर विभिन्न कर्मचारी संगठनों और सरकार के बीच कानूनी लड़ाई चलती रही है। साल 2016 में HC ने राज्य सरकार की तत्कालीन प्रमोशन पॉलिसी को अवैध करार दिया था। इसके बाद राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची, जहां से यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए गए। हालांकि, इन निर्देशों के लंबित रहते हुए भी सरकार ने जुलाई 2025 में एक नई प्रमोशन पॉलिसी लागू कर दी, जिसे लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया।
हाई कोर्ट के तीखे सवाल
HC ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि उसने पुरानी प्रमोशन पॉलिसी में किन-किन सुधारों को लागू करते हुए नई नीति बनाई है। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि नई पॉलिसी बनाते समय सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का कहां और किस तरह पालन किया गया है। इसके साथ ही HC ने सरकार से यह भी पूछा कि आर.बी. राय केस में दिए गए न्यायिक निर्देशों को नई प्रमोशन पॉलिसी में किस प्रकार शामिल किया गया है। कोर्ट का मानना है कि जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक नई नीति की वैधता पर फैसला देना संभव नहीं है।
सपाक्स और अजाक्स की दलीलें
सुनवाई के दौरान सपाक्स (सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग कर्मचारी संगठन) और अजाक्स (अनुसूचित जाति-जनजाति कर्मचारी संगठन) ने अपने-अपने तर्क मजबूती से रखे।
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सपाक्स की ओर से दलील दी गई कि नई प्रमोशन पॉलिसी सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन नहीं करती और यह पूर्व में निरस्त की जा चुकी नीति का ही संशोधित रूप है।
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वहीं अजाक्स ने पदोन्नति में आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताते हुए कहा कि इससे वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित किया जाता है।
फैसला सुरक्षित रखने के संकेत
सपाक्स के वकीलों का कहना है कि राज्य सरकार का पक्ष सुनने के बाद HC अपना फैसला सुरक्षित रख सकता है। उनका तर्क है कि यदि सरकार सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस और पूर्व न्यायिक निर्णयों का पालन साबित नहीं कर पाती है, तो नई प्रमोशन पॉलिसी पर भी कानूनी संकट खड़ा हो सकता है।
नई पॉलिसी पर क्यों उठे सवाल?
जुलाई 2025 में लागू की गई नई प्रमोशन पॉलिसी को लेकर यह आरोप लगाया गया है कि सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की पूरी तरह अनदेखी करते हुए लागू किया। सपाक्स का कहना है कि यथास्थिति के आदेश के बावजूद नीति में बदलाव करना न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन है। इसी आधार पर इस नीति को HC में चुनौती दी गई है।
सरकार की मुश्किलें बढ़ीं
HC के सवालों के बाद राज्य सरकार के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है। अब सरकार को यह साबित करना होगा कि नई नीति न केवल संवैधानिक है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट—दोनों के निर्देशों के अनुरूप भी है। एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करना सरकार के लिए बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
कर्मचारियों की नजरें फैसले पर
इस मामले का सीधा असर प्रदेश के लाखों शासकीय कर्मचारियों पर पड़ता है। पदोन्नति में आरक्षण को लेकर लंबे समय से असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कर्मचारी वर्ग अब इस मामले में स्पष्ट और अंतिम निर्णय की उम्मीद लगाए बैठा है, ताकि भविष्य की पदोन्नतियों को लेकर अनिश्चितता खत्म हो सके।
अगली सुनवाई 3 फरवरी
HC ने मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी को तय की है। माना जा रहा है कि सरकार के जवाब के बाद कोर्ट इस महत्वपूर्ण मामले में कोई बड़ा फैसला सुना सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह फैसला न केवल मध्य प्रदेश बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर बन सकता है। कुल मिलाकर, प्रमोशन में आरक्षण का यह मामला अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में हाई कोर्ट का रुख यह तय करेगा कि मध्य प्रदेश में पदोन्नति की दिशा और दशा क्या होगी।
