जैन रत्न प्रतिष्ठाचार्य अजीत शास्त्री देवलोकगमन से जैन समाज को अपूरणीय क्षति। जानिए उनके जीवन, सेवा, विद्वत्ता और समाज को दिए अमूल्य योगदान की पूरी कहानी।
राजेश जैन दद्दू इंदौर
प्रतिष्ठाचार्य अजीत शास्त्री देवलोकगमन – प्रारंभिक जानकारी
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि जैन समाज के ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रतिष्ठाचार्य अजीत शास्त्री का जन्म मुरार (ग्वालियर) में जैसवाल जैन समाज के श्रावक श्रेष्ठी स्वर्गीय मुंशीलाल जैन “कविवर” के घर हुआ था। वे बचपन से ही देव, शास्त्र और गुरु के प्रति समर्पित थे।
उनका जीवन सादगी, सेवा और साधना का अनूठा संगम था। प्रतिष्ठाचार्य अजीत शास्त्री देवलोकगमन से जैन समाज ने एक ऐसे मार्गदर्शक को खो दिया है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में असंभव है।
जन्म और बाल्यकाल
अजीत शास्त्री का जन्म धार्मिक वातावरण में हुआ। बचपन से ही उनमें स्वाध्याय का गहरा प्रेम था। वे सामान्य बच्चों की तरह खेल-कूद में नहीं, बल्कि शास्त्रों के अध्ययन में अधिक रुचि रखते थे। परिवार में धार्मिक संस्कार इतने गहरे थे कि वे छोटी उम्र से ही पूजा, विधान और पाठ में रुचि लेने लगे।
शिक्षा और विद्वत्ता का विकास
प्राकृत, संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी जैसी कई भाषाओं का उन्हें गहरा ज्ञान था। उन्होंने जैन दर्शन का गहन अध्ययन किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक ऐसे विद्वान के रूप में बनी जो शास्त्रों को केवल पढ़ता नहीं था, बल्कि उन्हें जीवन में उतारता था।
प्रतिष्ठाचार्य अजीत शास्त्री देवलोकगमन से विद्वत जगत ने एक अनमोल रत्न खो दिया है।
स्याद्वाद प्रेस सोनागिर का योगदान
उनके कुशल निर्देशन में स्याद्वाद प्रेस सोनागिर से सैकड़ों जैन साहित्य प्रकाशित हुए। यह प्रेस केवल एक मुद्रणालय नहीं था, बल्कि जैन संस्कृति का एक जीवंत केंद्र था। यहां से निकले ग्रंथ आज भी देशभर के मंदिरों, पुस्तकालयों और पाठशालाओं में पढ़ाए जाते हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों में भूमिका
उन्होंने अनेक बड़े-बड़े दिगंबराचार्यों के सान्निध्य में जिनबिंब पंचकल्याणक, विधान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को सफलतापूर्वक संपन्न कराया। हर आयोजन में उनकी योजना, अनुशासन और शुद्धता की चर्चा होती थी।
लोग कहते थे कि जहां अजीत शास्त्री होते हैं, वहां व्यवस्था अपने आप बन जाती है।
ज्योतिष और वास्तु में दक्षता
जैन दर्शन के साथ-साथ वे ज्योतिष और वास्तु के भी अच्छे ज्ञाता थे। समाज के लोग अपने घर, मंदिर और धर्मशाला के निर्माण से पहले उनसे परामर्श लेते थे। उनका मार्गदर्शन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी होता था।
तीर्थ विकास में योगदान
वर्तमान में वे जैसवाल जैन धर्मशाला सोनागिर और श्री जिनेश्वर धाम तीर्थ क्षेत्र बरई के अध्यक्ष पद पर सुशोभित थे। उनके निर्देशन में अतिशय क्षेत्र जिनेश्वर धाम तीर्थ बरई के विकास के लिए अनेक कार्य हुए—धर्मशाला, सड़क, जल व्यवस्था, यात्रियों की सुविधा आदि।
प्रतिष्ठाचार्य अजीत शास्त्री देवलोकगमन से इन तीर्थों को भी गहरा आघात लगा है।
समाज की प्रतिक्रिया और शोक
जैसे ही उनके देवलोकगमन का समाचार फैला, पूरे जैन जगत में शोक की लहर दौड़ गई। हर मंदिर, हर समाज और हर संगठन में शोक सभाएं आयोजित हुईं। लोग नम आंखों से उनके योगदान को याद करते रहे।
इंदौर एवं देशभर से श्रद्धांजलि
इंदौर दिगंबर जैन समाज के वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. जैनेन्द्र जैन, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोहर झांझरी, सामाजिक संसद के अध्यक्ष विनय बाकलीवाल, हंसमुख गांधी, टीके वेद, नरेंद्र वेद, मयंक जैन, भूपेंद्र जैन, सुशील पांड्या एवं फेडरेशन की राष्ट्रीय शिरोमणि संरक्षिका श्रीमती पुष्पा कासलीवाल, श्रीमती रेखा जैन, श्रीफल, श्रीमती मुक्ता जैन सहित अनेक समाजजनों ने गहरा शोक व्यक्त किया।
सभी ने कहा—“आपके निधन से जो रिक्त स्थान बना है, उसकी पूर्ति संभव नहीं।”
भविष्य के लिए उनकी प्रेरणा
प्रतिष्ठाचार्य अजीत शास्त्री देवलोकगमन केवल एक अंत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संदेश है—कि ज्ञान, सेवा और साधना से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। उनके जीवन से युवा पीढ़ी को सीख लेनी चाहिए कि धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम है।
