नागदा नेत्रदान की मिसाल बने 90 वर्षीय स्व. सरदारमल जैन। मरणोपरांत नेत्रदान से दो दृष्टिहीनों को मिला जीवन का उजास। पढ़िए पूरी प्रेरक कहानी।
नागदा नेत्रदान: मानवता की मिसाल की शुरुआत
नागदा नेत्रदान की यह कहानी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और सेवा की जीवंत मिसाल है। नागदा नगर में जब 90 वर्षीय स्व. सरदारमल जैन का देहावसान हुआ, तब किसी ने नहीं सोचा था कि उनका जाना दो अजनबी जिंदगियों में उजाला बनकर आएगा। लेकिन परिवार की सहमति और समाज की जागरूकता ने इस दुख को सेवा के पर्व में बदल दिया।
स्व. सरदारमल जैन: एक साधारण जीवन, असाधारण सोच
स्व. सरदारमल जैन नागदा के एक शांत, सरल और धर्मपरायण नागरिक थे। जीवन भर उन्होंने सादगी, ईमानदारी और सेवा को अपना मूल मंत्र बनाया। वे अक्सर कहते थे—
“अगर मरने के बाद भी किसी के काम आ सको, तो उससे बड़ी पूजा कोई नहीं।”
यही विचार उनके अंतिम समय में भी जीवित रहा और आगे चलकर नागदा नेत्रदान की ऐतिहासिक मिसाल बना।
मरणोपरांत नेत्रदान का निर्णय
16 जनवरी को उनके निधन के बाद परिवार गहरे शोक में था। लेकिन उसी समय दिगंबर जैन समाज नागदा के अध्यक्ष श्री सुनील जैन ने परिवार से नेत्रदान का सुझाव रखा। यह कोई आसान निर्णय नहीं था, परंतु स्व. सरदारमल जैन के जीवन मूल्यों को याद करते हुए परिवार ने तुरंत सहमति दे दी।
यहीं से नागदा नेत्रदान की वह कहानी शुरू हुई, जिसने पूरे नगर को भावुक कर दिया।
परिवार की भूमिका: सेवा में सहमति
पुत्र सुरेश जैन (एडवोकेट), राजेश जैन तथा पौत्र जतिन, दीपांशु और निखिल सहित पूरे परिवार ने एकमत होकर नेत्रदान के लिए स्वीकृति दी। यह केवल सहमति नहीं थी, बल्कि एक साहसिक और प्रेरणादायी निर्णय था।
उन्होंने कहा—
“पिताजी हमेशा दूसरों के लिए जीते रहे, अब उनके जाने के बाद भी वे किसी के लिए जीवन बनें, इससे बड़ी श्रद्धांजलि क्या हो सकती है।”
नागदा नेत्रदान: प्रक्रिया और टीम
नागदा नेत्रदान का यह 52वाँ सफल नेत्रदान बना। जैन सोशल ग्रुप नागदा के नेत्रदान प्रभारी ब्रजेश बोहरा के समन्वय से पूरी प्रक्रिया व्यवस्थित रूप से संपन्न हुई।
गीता भवन न्यास समिति, बड़नगर के नेत्रदान प्रभारी डॉ. जी. एल. ददरवाल के नेतृत्व में टीम सदस्य मनीष तलाच और परमानंद पंवार ने नेत्र संकलन की प्रक्रिया पूरी की। यह नेत्रदान न्यास समिति का क्रमांक 905 रहा।
पूरी प्रक्रिया सम्मान, संवेदनशीलता और गरिमा के साथ संपन्न की गई।
समाज की भागीदारी और भावनात्मक दृश्य
इस अवसर पर गीता भवन न्यास समिति और जैन सोशल ग्रुप नागदा की ओर से ग्रुप अध्यक्ष श्री धर्मेन्द्र बम ने परिजनों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने नवकार मंत्र का सामूहिक जाप करवाया और दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि दी।
मौके पर मनोज जैन, अनिल धूपिया, पंकज जैन, अनिल लुहाड़िया, संजय जैन, ब्रजेश भटेवरा सहित अनेक समाजजन उपस्थित थे। हर आंख नम थी, लेकिन दिल गर्व से भरा हुआ था।
दो दृष्टिहीनों के जीवन में नई रोशनी
नागदा नेत्रदान का सबसे बड़ा परिणाम यह रहा कि दो दृष्टिहीन व्यक्तियों को नई दृष्टि मिलने की संभावना बनी। जिन आंखों ने इस दुनिया को कभी नहीं देखा या देखना खो दिया था, अब वे फिर से रंगों, चेहरों और सपनों को देख सकेंगे।
यह केवल चिकित्सा उपलब्धि नहीं, बल्कि मानवता की सबसे सुंदर तस्वीर है।
नेत्रदान का महत्व
नेत्रदान से:
- दो लोगों को दृष्टि मिलती है
- एक व्यक्ति मरकर भी दो जिंदगियां रोशन करता है
- समाज में सेवा की भावना बढ़ती है
आज भी हजारों लोग कॉर्निया के अभाव में अंधेरे में जी रहे हैं। अगर हर परिवार एक नेत्रदान का संकल्प ले, तो यह समस्या बहुत हद तक समाप्त हो सकती है।
समाज के लिए संदेश
नागदा नेत्रदान हमें सिखाता है कि सेवा के लिए उम्र, धन या पद नहीं चाहिए—सिर्फ संवेदना चाहिए। स्व. सरदारमल जैन ने अपने जाने के बाद भी यह सिद्ध कर दिया कि इंसान मरता नहीं, वह अपने कर्मों में जीवित रहता है।
कैसे करें नेत्रदान
नेत्रदान करने के लिए:
- अपने परिवार को पहले से बताएं
- नजदीकी नेत्रदान संस्था से संपर्क रखें
- मृत्यु के बाद 6–8 घंटे के भीतर नेत्रदान संभव होता है
आप चाहें तो इन संस्थाओं से जुड़ सकते हैं:
- Eye Bank Association of India
- National Programme for Control of Blindness – भारत सरकार
निष्कर्ष
नागदा नेत्रदान केवल एक खबर नहीं, बल्कि एक आंदोलन की तरह है। स्व. सरदारमल जैन और उनके परिवार ने यह साबित कर दिया कि सच्ची श्रद्धांजलि फूलों से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में रोशनी भरने से मिलती है।
यह कहानी हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो सोचता है कि वह समाज के लिए क्या कर सकता है। शायद उसका उत्तर यही है—
“मरने के बाद भी किसी को जीने का मौका दे जाना।”


