भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ता दबाव
नई दिल्ली: भारत इन दिनों एक कठिन स्थिति का सामना कर रहा है। देश को न तो रूस से तेल खरीदना बंद करना है और न ही US द्वारा Tariff लगाने की धमकी को नजरअंदाज किया जा सकता है। तेल हमेशा से भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता रहा है, लेकिन वैश्विक राजनीति में बढ़ते तनाव के कारण अब यह संवेदनशीलता और बढ़ गई है।
अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल के खरीदारों पर कड़े प्रतिबंध लगाने का संकेत दिया है। इस बीच, भारत ने 140 करोड़ की आबादी की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूस से तेल खरीदना जारी रखा है। अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी तक का टैरिफ लगाने की धमकी दी है, जिससे भारत सहित चीन और ब्राजील जैसी अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ गया है।
US का नया Tariff और भारत
US ने हाल ही में ईरान के ट्रेड पार्टनर्स पर 25 फीसदी अतिरिक्त Tariff लगाने की घोषणा की है। भारत ईरान के बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। ऐसे में माना जा रहा है कि यह नया टैरिफ भारत पर भी लागू हो सकता है।
नई दिल्ली में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने पदभार ग्रहण के बाद कहा कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर बातचीत 13 जनवरी को फिर से शुरू हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार संबंध सच्ची दोस्ती और विश्वास पर आधारित हैं।
500 फीसदी Tariff की धमकी
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर जुर्माना लगाने वाला एक द्विदलीय विधेयक मंजूर किया। इसके तहत भारत पर 500 फीसदी तक का टैरिफ लग सकता है। इससे नीति और आर्थिक हलकों में चिंताएं बढ़ गई हैं।
यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने रूस पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए। भारत ने इन प्रतिबंधों में शामिल नहीं हुआ, लेकिन वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता के बीच रूस से तेल खरीदने के लिए उसे राजनयिक दबाव का सामना करना पड़ा।
भारत ने रूस से तेल आयात कम किया
अमेरिका के दबाव और वैश्विक अस्थिरता के कारण भारत ने हाल ही में रूस से तेल आयात कम किया है। इसके बावजूद, भारत में ईंधन की मांग लगातार बढ़ रही है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि पिछले महीने भारत में ईंधन की खपत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि तेल आपूर्ति में कोई व्यवधान कीमतों को बढ़ा सकता है, मुद्रास्फीति बढ़ा सकता है और आर्थिक विकास को धीमा कर सकता है।
तेल बन गया रणनीतिक हथियार
लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) जेएस सोढ़ी के अनुसार, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। देश की लगभग 90 फीसदी कच्ची तेल की जरूरतें आयात से पूरी होती हैं।
यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी टैरिफ ने भारत की तेल स्रोत रणनीति को पूरी तरह बदल दिया है। तेल अब केवल ईंधन नहीं बल्कि भू-राजनीतिक और आर्थिक रणनीति का हिस्सा बन गया है।
रूस से तेल खरीद का पैमाना
CSR Journal के अनुसार, भारत ने 2022 से अब तक 140 अरब यूरो से अधिक मूल्य का रूसी तेल खरीदा है। इससे रिफाइनरियों को लागत कम करने और घरेलू ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिली।
रूसी तेल भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 45 प्रतिशत था। लेकिन प्रतिबंधों और बीमा जोखिम के कारण यह हिस्सा घटने लगा है। तेल संबंधी निर्णय अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक भी बन गए हैं।
अमेरिका और वेनेजुएला का तेल
अमेरिका ने भारत को वेनेजुएला का तेल बेचने के लिए तैयार होने का संकेत दिया है। इस कदम से अमेरिका रूस से तेल खरीद को रोकने और टैरिफ दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
यह समझौता लगभग 2 अरब डॉलर के वेनेजुएला के कच्चे तेल (30-50 मिलियन बैरल) के निर्यात के लिए किया गया है। इसके तहत अमेरिका ने वेनेजुएला के तेल को वैश्विक बाजार में बेचने के लिए तैयार रहने का संदेश दिया।
भारत के विकल्प और रणनीति
अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस्टोफर राइट ने कहा कि देश या तो अमेरिका के साथ मिलकर तेल बेच सकते हैं या नहीं बेच सकते। उन्होंने यह भी कहा कि तेल प्रवाह और राजस्व पर अमेरिकी नियंत्रण को वेनेजुएला के अस्थिर शासन और आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए एक रणनीतिक हथियार के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
भारत को अब यह फैसला करना होगा कि वह वेनेजुएला और रूस से तेल खरीद को कैसे संतुलित करे, ताकि ऊर्जा सुरक्षा और अमेरिकी टैरिफ से बचाव दोनों सुनिश्चित हो सकें।
निष्कर्ष: रणनीतिक संतुलन की चुनौती
भारत इस समय एक जटिल रणनीतिक संतुलन के बीच खड़ा है। रूस से तेल खरीदना जारी रखना और अमेरिका की टैरिफ धमकियों का सामना करना एक कठिन चुनौति है।
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल अब केवल अर्थव्यवस्था का सवाल नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति और भू-राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा बन गया है। आने वाले महीनों में भारत की ऊर्जा नीति और तेल आयात निर्णय दुनिया के सामने इस रणनीतिक संतुलन की परीक्षा होंगे।
