Bharat में 29% लोग मोटे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत बना कारण
Bharat में डिब्बाबंद और अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड (जैसे इंस्टेंट नूडल्स, चिप्स, बिस्किट, पैकेज्ड ड्रिंक्स) अब सिर्फ कभी‑कभार खाने की वस्तु नहीं रहे वे रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा बनते जा रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर असर हो रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह वही खाने‑पीने की आदत है जिसे अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में दोषपूर्ण बताया गया था, और अब भारत उसे तेजी से अपना रहा है।
अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड की बिक्री में तेज़ उछाल
अध्ययनों के मुताबिक Bharat में अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड (UPFs) की खुदरा बिक्री 2006 से 2019 के बीच लगभग 40 गुना बढ़ चुकी है — यह $0.9 बिलियन से बढ़कर लगभग $38 बिलियन तक पहुंच गई है। इन खाद्य पदार्थों में अक्सर फैट, चीनी, नमक और अडिटिव्स की मात्रा अधिक होती है, जबकि पोषक तत्व कम होते हैं।
इसी दौरान Bharat में पैक्ड/प्रोसेस्ड फूड की प्रति व्यक्ति बिक्री भी दोगुनी हो चुकी थी — 2012 में लगभग ₹2,800 प्रतिवर्ष से बढ़कर 2018 तक ₹5,200 के स्तर तक पहुंच गई थी (हालांकि इसके लिए अलग‑अलग रिपोर्टों के आंकड़े अलग हो सकते हैं)। इससे स्पष्ट है कि पैकेज्ड भोजन अब बहुत से घरों के रोज़मर्रा के खाने का हिस्सा बन गया है।
आईसीआरआईईआर के आंकड़ों के अनुसार, 2011‑21 के दौरान अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड की खुदरा बिक्री लगभग 13% वार्षिक दर से बढ़ी है, जो कि स्वास्थ्य और खानपान के पैटर्न में बदलाव को दर्शाता है।
स्वास्थ्य पर गहरा असर मोटापा डायबिटीज और बच्चे भी प्रभावित
ये खाने‑पीने की आदतें न सिर्फ वयस्कों में बल्कि बच्चों में भी स्वास्थ्य चिंताओं को बढ़ा रही हैं:
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लगभग 28.6% लोग ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित हैं — यानी लगभग हर चौथा व्यक्ति इस स्थिति से जूझ रहा है।
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11.4% लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं।
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लगभग 15.3% में प्रीडायबिटीज की स्थितियाँ देखी गई हैं, जो भविष्य में डायबिटीज का जोखिम बढ़ाती हैं।
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लगभग 39.5% लोगों में पेट की चर्बी (abdominal obesity) बढ़ी हुई है, जो हृदय रोग और अन्य जोखिमों से जुड़ी होती है।
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बच्चों में मोटापे की संख्या भी बढ़ रही है — NFHS डेटा के अनुसार यह 2.1% से बढ़कर लगभग 3.4% तक पहुंच गई है।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड की बढ़ती खपत सीधे तौर पर मोटापा और जीवनशैली संबंधित रोगों, जैसे टाइप‑2 डायबिटीज और हृदय रोगों से जुड़ी हुई है।

क्यों अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड खतरनाक हैं?
अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड वो खाद्य पदार्थ हैं जिन्हें कई औद्योगिक प्रक्रियाओं से गुज़रकर तैयार किया जाता है, और इनमें उच्च मात्रा में अतिरिक्त चीनी, नमक, अनहेल्दी वसा और रासायनिक अडिटिव्स होते हैं। ये स्वाद और शेल्फ‑लाइफ बढ़ाने के लिए तैयार किए जाते हैं, लेकिन पोषण के लिहाज़ से ये बेहद कमज़ोर होते हैं और शरीर को ऊर्जा घनी लेकिन पोषणहीन कैलोरीज़ प्रदान करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे खाद्य पदार्थ पेट की चर्बी बढ़ाते हैं, मोटापा और इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ाते हैं और लंबे समय में दिल‑और‑धमनियों, किडनी और अन्य रोगों का जोखिम बढ़ाते हैं।
लेबलिंग और नियमन में कमी
Bharat में अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड का स्पष्ट कानूनी परिभाषा न होने, लेबलिंग नियमों की कमी और कम कठोर रेगुलेटरी उपायों के कारण लोग अक्सर इन उत्पादों को “स्वस्थ विकल्प” समझ बैठते हैं। फ्रंट‑ऑफ‑पैक चेतावनी लैबलिंग (Front‑of‑Pack Warning Labels) अभी तक व्यापक और प्रभावी रूप से लागू नहीं हुई है, जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे जरूरी बताते हैं।
ऊर्जा‑घने पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर भ्रामक विज्ञापन और आकर्षक मार्केटिंग भी इन उत्पादों की खपत को बढ़ाते हैं, खासकर बच्चों और युवाओं को लक्ष्य करके विज्ञापन कराने की वजह से।
क्या कदम उठाने ज़रूरी हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड से जुड़ी स्वास्थ्य समस्या को केवल बाजार‑आधारित समाधान से नहीं रोका जा सकता; इसके लिए समन्वित नीति कदम लेने होंगे:
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अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड की स्पष्ट परिभाषा देश की खाद्य नीतियों में शामिल हो।
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फ्रंट‑ऑफ‑पैक चेतावनी लेबलिंग लागू हो ताकि उपभोक्ता आसानी से समझ सकें कि कौन से उत्पाद उच्च चीनी, नमक वा अनहेल्दी वसा से भरे हैं।
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भ्रामक विज्ञापन पर रोक या सीमाएं तय की जाएं, खासकर बच्चों को लक्षित विज्ञापन पर।
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अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड पर स्वास्थ्य टैक्स लगाया जाए और ताज़े/स्वस्थ खाद्य पदार्थों को सब्सिडी दी जाए ताकि सस्ती और स्वास्थ्य‑वर्धक विकल्प बढ़ें।
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स्कूलों और समुदायों में पोषण शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए ताकि लोग खाद्य विकल्पों के बीच अंतर समझ सकें।
निष्कर्ष
Bharat में अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता उपभोग सिर्फ स्वाद या सुविधा की बात नहीं रहा यह एक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है। मोटापा, डायबिटीज और अन्य जीवनशैली‑सम्बंधित रोगों की दर तेजी से बढ़ रही है, जिसका एक बड़ा कारण इन तैयार‑खाद्य पदार्थों का दैनिक आहार में खपत का बढ़ता पैटर्न है। अगर समय रहते नीतिगत और सांस्कृतिक बदलाव नहीं लाए गए, तो यह संकट भविष्य में और गंभीर स्वास्थ्य बोझ पैदा कर सकता है।
