हार्दिक हुंडिया जैन एकता अभियान के तहत जैन समाज को जोड़ने, धर्म में फैल रहे शिथिलाचार पर सवाल और जन कल्याण पार्टी की वैचारिक राजनीति की विस्तृत रिपोर्ट।
प्रस्तावना: जैन समाज और आत्ममंथन
हार्दिक हुंडिया जैन एकता अभियान आज केवल एक विचार नहीं, बल्कि जैन समाज के भीतर चल रहे आत्ममंथन की आवाज बन चुका है। विश्व में भारत की पहचान अहिंसा, करुणा और संयम से है, लेकिन उसी पहचान को सबसे अधिक क्षति अगर कहीं से हो रही है, तो वह समाज के भीतर से ही हो रही है—ऐसा मानना है जैन समाज के अग्रणी चिंतक हार्दिक हुंडिया का।
हार्दिक हुंडिया का स्पष्ट दृष्टिकोण
हार्दिक हुंडिया कहते हैं कि जैन धर्म की मूल भावना को कुछ स्वार्थी संस्थाओं और तथाकथित धर्म ठेकेदारों ने अपने फायदे के लिए बदल दिया है। जैन धर्म, जो आत्मशुद्धि और परोपकार का मार्ग दिखाता है, उसे व्यापार और प्रभाव का माध्यम बना दिया गया है।
जैन धर्म को सबसे ज्यादा नुकसान किससे?
हार्दिक हुंडिया का सवाल सीधा है—
“नास्तिकों से ज्यादा नुकसान आस्तिकों ने किया है।”
उनके अनुसार, साधु वेश में रहते हुए अगर कोई साधु संसारिक प्रवृत्तियों में लिप्त है, नियमों का पालन नहीं करता, तो वह साधु कैसे कहलाएगा?
चारों संप्रदायों को एक मंच पर लाने का प्रयास
हार्दिक हुंडिया जैन एकता अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि रही—
श्वेतांबर, दिगंबर, तेरापंथी और स्थानकवासी संप्रदायों के पत्रकारों को एक मंच पर लाना।
कलम के माध्यम से समाज में चेतना, प्रश्न और जागृति लाई गई।
संघ और साधु-संस्थाओं पर तीखा सवाल
हार्दिक हुंडिया पूछते हैं—
अगर संघ को 25वां तीर्थंकर कहा जाता है, तो फिर साधुओं में बढ़ते शिथिलाचार पर संघ चुप क्यों है?
पत्रकारिता के माध्यम से समाज जागरण
उनका मानना है कि समाज को आईना दिखाने का सबसे सशक्त माध्यम पत्रकारिता है।
जब तक सवाल नहीं पूछे जाएंगे, तब तक सुधार संभव नहीं।

जन कल्याण पार्टी और वैचारिक राजनीति
राष्ट्रीय संत नीलेश चंद्रजी से प्रेरित
जन कल्याण पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में हार्दिक हुंडिया ने स्पष्ट किया कि उनकी राजनीति सत्ता नहीं, सेवा केंद्रित है।
समाज से राजनीति तक नेतृत्व
जो लोग बिना स्वार्थ समाज सेवा कर रहे हैं, उन्हें राजनीति में आना चाहिए—
ताकि समाज की पीड़ा नीति निर्धारण तक पहुंचे।
जैन समाज का राष्ट्र निर्माण में योगदान
देश का लगभग 24% टैक्स देने वाला समाज
हर आपदा में सबसे पहले सेवा में खड़ा रहने वाला समाज
आज अपने अस्तित्व पर सवाल कर रहा है—यह चिंता का विषय है।
उद्योग, व्यापार और सामाजिक जिम्मेदारी
हार्दिक हुंडिया ने देश के अग्रणी उद्योगपतियों—
भरत शाह,
पृथ्वीराज कोठारी,
निरंजन हीरानंदानी,
राज के पुरोहित
का उल्लेख करते हुए कहा कि जब गुजराती–मारवाड़ी समाज राजनीति में आगे बढ़ सकता है, तो जैन समाज क्यों नहीं?
जैन धर्म: परोपकार और करुणा का मार्ग
जैन धर्म “सभी जीवों का कल्याण” सिखाता है।
यह धर्म स्वार्थ नहीं, परमार्थ की नींव पर खड़ा है।
निष्कर्ष: एकता से ही अस्तित्व सुरक्षित
हार्दिक हुंडिया जैन एकता अभियान कोई व्यक्ति विशेष नहीं,
यह एक चेतना है—
जो जैन समाज को एक होकर
देश के सुशासन की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने का आह्वान करती है।
