सरस्वती नन्दन स्वामी गुरुदेव अखण्ड नाम संकीर्तन सप्ताह में थांदला बना भक्ति का केंद्र। पादुका पूजन, महाआरती और सेवा भाव से झूमे श्रद्धालु।
सरस्वती नन्दन स्वामी गुरुदेव अखण्ड नाम संकीर्तन : भक्ति की अविरल धारा
सरस्वती नन्दन स्वामी गुरुदेव अखण्ड नाम संकीर्तन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक परंपरा है जिसमें भक्त, भजन और भगवान एकाकार हो जाते हैं। थांदला नगर में चल रहा यह अखण्ड नाम संकीर्तन सप्ताह श्रद्धा, साधना और सेवा का ऐसा जीवंत उदाहरण है, जो हर वर्ष नगर को आध्यात्मिक चेतना से भर देता है।
गुरुदेव सरस्वती नन्दन स्वामीजी की दिव्य परंपरा
भारत की संत परंपरा में श्री नरसिंह सरस्वती कारंजा महाराज के कृपापात्र शिष्य सरस्वती नन्दन स्वामीजी महाराज का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। गुरु चरित्र की रचना कर उन्होंने जन-जन को यह संदेश दिया कि गुरु के पदचिन्हों पर चलकर ही आत्मिक उन्नति संभव है।
लगातार वर्षों की अखण्ड साधना के बाद गुरुदेव ने थांदला की तपोभूमि पर समाधि ली और भगवान विट्ठलस्वामी के स्वरूप में प्रगट होकर भक्तों को दर्शन दिए—यह घटना आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है।
थांदला : तप, साधना और संकीर्तन की भूमि
थांदला
थांदला केवल एक नगर नहीं, बल्कि वह भूमि है जहाँ साधना सांसों में बसती है। गुरुदेव के तप-समाधि स्थल बैकुंठ धाम (गुरुद्वारा) में वर्षों से चला आ रहा अखण्ड नाम संकीर्तन इस नगर को ‘छोटी काशी’ का स्वरूप प्रदान करता है।
अखण्ड कीर्तन सप्ताह का आध्यात्मिक प्रभाव
27 दिसंबर से प्रारंभ हुए अखण्ड नाम संकीर्तन सप्ताह में गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान सहित अनेक प्रांतों से श्रद्धालु पहुंचे। टोली बनाकर दिन-रात चलने वाला संकीर्तन वातावरण को दिव्यता से भर देता है।
भजन, नामस्मरण और गुरु महिमा का ऐसा समागम विरले ही देखने को मिलता है।
3 जनवरी को अरुणोदय वेला में पादुका पूजन
3 जनवरी को प्रातः अरुणोदय वेला में होने वाला पादुका पूजन और महाआरती इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहेगा। इस अवसर पर गुरुदेव के चरणों में श्रद्धालु नतमस्तक होकर जीवन में सद्मार्ग का संकल्प लेते हैं।
गुरुद्वारा बैकुंठ धाम की दिव्य छटा
प्रातः 9:30 बजे एवं रात्रि 8:30 बजे विट्ठलस्वामीजी, रुक्मणी-सत्यभामा, सरस्वती माता और गुरुदेव की आरती होती है। चरणामृत व प्रसाद ग्रहण कर श्रद्धालु स्वयं को धन्य मानते हैं।
सेवा, समर्पण और अनुशासन का संगम
इस आयोजन की विशेषता है—निःस्वार्थ सेवा। आश्रम प्रभारी, न्यास पदाधिकारी, आयोजन संयोजक, समिति संचालक और मातृशक्ति सभी मिलकर गुरु भाई-बहनों की सेवा में जुटे रहते हैं।
यही सेवा भाव इस आयोजन को विशिष्ट बनाता है।
दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु
गुरुभक्तों का कहना है कि अखण्ड नाम संकीर्तन में बैठना केवल भजन सुनना नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने की प्रक्रिया है। कई श्रद्धालु हर वर्ष इस आयोजन में शामिल होना अपना सौभाग्य मानते हैं।
निष्कर्ष : क्यों कहलाता है थांदला ‘छोटी काशी’
सरस्वती नन्दन स्वामी गुरुदेव अखण्ड नाम संकीर्तन थांदला को केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान भी देता है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कारों की अमूल्य धरोहर है।

