अरावली विवाद पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सफाई दी। जानिए 100 मीटर मापदंड का सच, यूट्यूब चैनल्स पर उनकी लताड़, और कैसे अरावली का 90% से ज्यादा क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित है। पूरी खबर यहां पढ़ें।
अरावली विवाद पर भूपेंद्र यादव की सफाई: यूट्यूब चैनल्स फैला रहे भ्रम, 90% एरिया संरक्षित
1. अरावली विवाद: मंत्री ने तोड़ी चुप्पी
अरावली विवाद (Aravalli Dispute) पर लंबे समय से चली आ रही चुप्पी को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने तोड़ दिया है। उन्होंने साफ किया कि अरावली में किसी भी तरह का ढील नहीं दी गई है और 90% से अधिक क्षेत्र पूरी तरह संरक्षित है। उन्होंने कहा कि यह विवाद गलत जानकारी फैलाने का नतीजा है।
उनके मुताबिक, अरावली भारत के चार राज्यों- दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात के 39 जिलों में फैली हुई है। इस पूरे 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में मात्र 0.19% (लगभग 2%) हिस्से में ही कानूनी तौर पर खनन की पात्रता हो सकती है। बाकी का विशाल भूभाग सुरक्षित है।
2. यूट्यूबर्स पर सीधा निशाना, क्या कहा?
केंद्रीय मंत्री ने अरावली विवाद को लेकर सोशल मीडिया, विशेषकर कुछ यूट्यूब चैनल्स पर सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इन चैनल्स और कुछ लोगों ने ‘100 मीटर’ के मापदंड को लेकर जानबूझकर भ्रम और कन्फ्यूजन फैलाया है। उन्होंने इसे “गलत प्रचार” बताते हुए कहा कि इससे जनता में गलत धारणा बनी।
यादव ने दो टूक शब्दों में कहा, “कुछ लोग यह गलत प्रचार कर रहे हैं कि 100 मीटर का मतलब पहाड़ी के ऊपर से नीचे की खुदाई की अनुमति है। यह पूरी तरह गलत है।”

3. 100 मीटर मापदंड का सच क्या है? समझिए पूरा गणित
अरावली विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा ‘100 मीटर’ के नियम को लेकर हुई। मंत्री ने इसे विस्तार से समझाया:
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भूमि के आधार से माप: 100 मीटर की सुरक्षा सीमा पहाड़ी के सबसे निचले आधार (बेस) से मापी जाएगी। यानी, जमीन के अंदर जहां तक पहाड़ी की जड़ें हैं, वहां से ऊपर की ओर 100 मीटर तक का पूरा इलाका संरक्षित रहेगा।
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ऊपर से नीचे नहीं: इसका मतलब यह कतई नहीं है कि पहाड़ी की चोटी से 100 मीटर नीचे तक खुदाई की जा सकती है। यह गलतफहमी फैलाई गई।
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पहाड़ियों के बीच की भूमि भी सुरक्षित: मंत्री ने एक अहम बात कही कि अगर दो अरावली पहाड़ियों के बीच की दूरी सिर्फ 500 मीटर है, तो वह पूरा का पूरा इलाका अरावली रेंज का हिस्सा माना जाएगा और संरक्षित रहेगा।
4. अरावली का 90% हिस्सा क्यों है अब सुरक्षित?
भूपेंद्र यादव ने बताया कि इस स्पष्ट और सख्त परिभाषा को लागू करने का सीधा फायदा यह हुआ है कि अरावली का 90% से अधिक क्षेत्र स्वतः ही संरक्षित क्षेत्र (प्रोटेक्टेड एरिया) में आ गया है। पहले जहां केवल पहाड़ी चोटियों या विशिष्ट क्षेत्रों को ही सुरक्षा मिलती थी, वहीं अब पहाड़ियों के आस-पास का बफर जोन और उनके बीच की भूमि भी सुरक्षा के दायरे में आ गई है।
इससे अवैध खनन पर अंकुश लगाने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य ग्रीन अरावली को बढ़ावा देना है, न कि खनन गतिविधियों को।
5. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में सरकार का साथ
केंद्रीय मंत्री ने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के सभी निर्देशों का पूरा समर्थन करती है। अरावली को लेकर कानूनी लड़ाई 1985 से चल रही है और सरकार का उद्देश्य हमेशा से स्पष्ट नियम बनाना रहा है।
यह नई परिभाषा वैज्ञानिक मानकों और न्यायालय के मार्गदर्शन पर आधारित है, जिससे भविष्य में किसी भी तरह के भ्रम की गुंजाइश खत्म हो गई है। सरकार प्राकृतिक विरासत और आने वाली पीढ़ियों के हित को सर्वोपरि रखते हुए काम कर रही है।
6. दिल्ली में माइनिंग पर सख्त रोक
दिल्ली के संदर्भ में मंत्री ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजधानी के अरावली क्षेत्र में कोई भी खनन गतिविधि पूरी तरह से प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा, “दिल्ली में कोई भी माइनिंग मान्य नहीं है।” यहां 20 से अधिक वन आरक्षित और संरक्षित क्षेत्र मौजूद हैं, जिन पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।
7. ग्रीन अरावली पहल: सरकार की बड़ी योजना
भूपेंद्र यादव ने ग्रीन अरावली पहल का जिक्र करते हुए बताया कि सरकार पिछले दो साल से इस पर काम कर रही है। इसके तहत हर जिले में अधिकारियों के साथ बैठकें करके अरावली के संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के उपाय किए जा रहे हैं।
उन्होंने जयपुर में डीएफओ (वन अधिकारी) के साथ हुई बैठक का उदाहरण दिया और कहा कि यह अभियान जारी रहेगा। सरकार का संकल्प है कि अरावली न सिर्फ सुरक्षित रहे, बल्कि हरा-भरा भी बने।
8. भविष्य में क्या होगा अरावली का?
इस स्पष्ट नीति और सख्त नियमों के बाद अरावली का भविष्य अधिक सुरक्षित दिखाई देता है। 90% क्षेत्र के संरक्षित होने से जैव विविधता का संरक्षण होगा, जल स्तर सुधरेगा और प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी।
हालांकि, चुनौती इन नियमों के कड़ाई से पालन और अवैध गतिविधियों पर नजर रखने की होगी। सरकार ने इसके लिए तकनीकी निगरानी और जनता की भागीदारी पर जोर दिया है।
9. निष्कर्ष: पर्यावरण बनाम विकास में संतुलन
अरावली विवाद पर केंद्रीय मंत्री की सफाई से स्पष्ट है कि सरकार पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है। भूपेंद्र यादव ने गलत सूचना फैलाने वालों की आलोचना करते हुए तथ्यों को रखा है। अब 100 मीटर के नियम को लेकर कोई भ्रम नहीं रह गया है और अरावली के विशाल हिस्से को कानूनी सुरक्षा मिल गई है।
यह एक संतुलित दृष्टिकोण है, जहां विकास की जरूरतों के साथ-साथ प्रकृति के संरक्षण को भी उतना ही महत्व दिया गया है। आने वाले समय में ग्रीन अरावली पहल के सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
