जैन धर्म में शोध : कर्तव्यबोध के साथ संस्कृति संरक्षण पर राष्ट्रीय संगोष्ठी इंदौर में संपन्न
जैन धर्म में शोध को जन-जन तक पहुंचाने के संकल्प के साथ इंदौर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्राकृत वाङ्मय, सिरि भूवलय और जैन दर्शन पर गहन मंथन हुआ। अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के मार्गदर्शन में विद्वानों ने संस्कृति संरक्षण पर विचार रखे।
जैन धर्म में शोध केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित न रहकर जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है। इसी भाव के साथ श्री दिगंबर जैन उदासीन आश्रम ट्रस्ट एवं कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इंदौर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिन प्राकृत वाङ्मय, जैन दर्शन और सिरि भूवलय ग्रंथ के विविध आयामों पर गहन चिंतन हुआ।
राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्देश्य
इस संगोष्ठी का मूल उद्देश्य जैन धर्म में शोध को समाजोपयोगी बनाना, प्राकृत वाङ्मय के माध्यम से सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण करना और प्राचीन जैन ग्रंथों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ना रहा। विद्वानों ने माना कि शोध तभी सार्थक है जब वह जन-जीवन में उतरे।
प्रथम सत्र : मुनि श्री का प्रेरक संदेश
प्रथम सत्र का शुभारंभ अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज के सान्निध्य में मंगलाचरण से हुआ। अपने आशीर्वचन में मुनि श्री ने कहा—
“जैन धर्म में शोध को जन-जन तक पहुंचाना हम सभी का कर्तव्य है। यदि धर्म-शोध से प्राप्त एक भी सूत्र जीवन में उतर जाए, तो जीवन सरल और सार्थक बन सकता है।”
यह संदेश शोधकर्ताओं और समाजजनों के लिए दिशा-सूचक सिद्ध हुआ। सत्र में प्राकृत भाषा पर आधारित एक लघु नाटिका का मंचन भी हुआ, जिसने भाषा और दर्शन को रोचक रूप में प्रस्तुत किया।

सत्र की अध्यक्षता और विद्वत विचार
प्रथम सत्र की अध्यक्षता कालिदास अकादमी के निदेशक डॉ. गोविंद गंधेय ने की। उन्होंने कहा कि प्राकृत वाङ्मय केवल धार्मिक ग्रंथों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है।
इस सत्र में निम्न विषयों पर विस्तार से विचार हुए—
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प्राकृत वाङ्मय की सांस्कृतिक भूमिका
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जैन दर्शन का दार्शनिक व वैज्ञानिक पक्ष
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ग्रंथों के संरक्षण की आवश्यकता
सिरि भूवलय और जैन अध्ययन
रेखा जैन ने बताया कि संगोष्ठी में सिरि भूवलय ग्रंथ में ‘ॐ’ के स्थान, भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में जैन अध्ययन तथा जैन धर्म में शोध के वैश्विक प्रभाव पर विशद मीमांसा की गई।
यह भी बताया गया कि आज अनेक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय जैन दर्शन को पाठ्यक्रम में शामिल कर रहे हैं, जिससे इसकी सार्वभौमिक प्रासंगिकता सिद्ध होती है।
अतिथि सम्मान और सहभागिता
अतिथियों का सम्मान ट्रस्ट अध्यक्ष अमित कासलीवाल एवं पदाधिकारियों द्वारा किया गया। इस अवसर पर समाज के वरिष्ठ जन—
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डॉ. अनुपम जैन
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डॉ. जैनेन्द्र जैन
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संजय पापड़ीवाल
आदि की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र का संचालन डॉ. सरिता जैन दोसी ने किया।
द्वितीय सत्र : सिरि भूवलय का गणितीय व आध्यात्मिक स्वरूप
द्वितीय सत्र में सिरि भूवलय के अलौकिक, गणितीय एवं आध्यात्मिक स्वरूप पर केंद्रित विषयों का प्रवर्तन किया गया। विद्वानों ने ग्रंथ की—
- रचनात्मक संरचना
- सांकेतिक लिपि
- आध्यात्मिक संकेत
- आधुनिक संदर्भों में उपयोगिता
पर तथ्यात्मक विवेचन प्रस्तुत किया। इस सत्र में भी अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। संचालन डॉ. यतीश जैन ने किया।
समापन सत्र : विमोचन और सम्मान
समापन सत्र की अध्यक्षता देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राकेश सिंघई ने की। प्रतिवेदन डॉ. जयकुमार उपाध्याय ने प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर सिरि भूवलय ग्रंथ का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया तथा विद्वानों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अरविंद्र जैन ने किया। बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
जैन धर्म में शोध : समाज के लिए संदेश
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने यह स्पष्ट किया कि जैन धर्म में शोध केवल ग्रंथों तक सीमित न होकर जीवन-व्यवहार में उतरने योग्य है। प्राकृत वाङ्मय और जैन दर्शन आज भी आधुनिक समाज को नैतिकता, अहिंसा और आत्मशुद्धि का मार्ग दिखा सकते हैं।
