Dollar के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर रुपया, बढ़ती आर्थिक चुनौतियों ने बढ़ाई चिंता
भारतीय मुद्रा रुपया एक बार फिर दबाव में दिखाई दे रहा है। शुक्रवार को रुपये ने अमेरिकी Dollar के मुकाबले 90.41 का स्तर छूते हुए अपना दूसरा रिकॉर्ड निचला स्तर दर्ज किया। दिन की शुरुआत भी कमजोर रही और शुरुआती कारोबार में रुपया 90.55 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक फिसल गया। हालांकि दोपहर के सत्र में थोड़ी रिकवरी देखने को मिली, लेकिन बाजार बंद होते-होते रुपये ने फिर कमजोरी के साथ सत्र समाप्त किया।
विशेषज्ञों के मुताबिक, रुपये की इस गिरावट के पीछे केवल एक कारण नहीं, बल्कि तीन बड़े आर्थिक जोखिम जिम्मेदार हैं, जिन्होंने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। इनमें अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में देरी, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और डॉलर की बढ़ती मांग प्रमुख हैं। इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव भारतीय मुद्रा पर लगातार दबाव बना रहा है।
कारोबार के दौरान कैसे टूटा रुपया?
शुक्रवार को भारतीय रुपया अमेरिकी Dollar के मुकाबले 90.31 के स्तर पर खुला, जो पहले ही एक ऐतिहासिक निचला स्तर था। कारोबार के शुरुआती घंटों में कमजोरी और गहराई और रुपया 90.55 तक पहुंच गया। दोपहर के सत्र में हालांकि कुछ राहत मिली और यह 90.37 तक मजबूत हुआ, लेकिन यह सुधार ज्यादा देर टिक नहीं सका। अंततः रुपया 90.41 पर बंद हुआ, जो बाजार की कमजोरी और अनिश्चितता को साफ तौर पर दर्शाता है।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि रुपये की यह चाल दर्शाती है कि फिलहाल करेंसी मार्केट में भावनात्मक और संरचनात्मक दोनों तरह का दबाव बना हुआ है। जब तक इन जोखिमों का समाधान नहीं होता, तब तक रुपये में स्थिरता की उम्मीद करना मुश्किल होगा।
पहला बड़ा जोखिम: अमेरिका के साथ ट्रेड डील में देरी
रुपये पर दबाव का सबसे बड़ा कारण भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में देरी माना जा रहा है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच द्विपक्षीय सहयोग को लेकर बातचीत जरूर हुई, लेकिन टैरिफ में किसी ठोस राहत का संकेत नहीं मिला।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के बाद से ही भारतीय निर्यात और विदेशी निवेशकों की धारणा पर असर पड़ा है। बाजार को उम्मीद थी कि व्यापार समझौते को लेकर कोई सकारात्मक घोषणा होगी, लेकिन अनिश्चितता बनी रहने से रुपये पर दबाव और बढ़ गया।
विश्लेषकों का मानना है कि रुपये की मजबूती अब काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत सरकार अमेरिका के साथ अंतिम व्यापार समझौते की घोषणा कब करती है। जब तक इस मोर्चे पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक मुद्रा बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
दूसरा दुश्मन: विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली
रुपये की कमजोरी का दूसरा बड़ा कारण विदेशी निवेशकों (FPI) की लगातार मुनाफावसूली है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने इस साल भारतीय शेयर बाजार से करीब 18 अरब डॉलर की निकासी की है।
अगर मौजूदा महीने की बात करें, तो विदेशी निवेशक अब तक लगभग 18 हजार करोड़ रुपये के शेयर बेच चुके हैं। दिसंबर इस साल का आठवां महीना है, जब विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से पैसा निकाला है। पिछले 15 महीनों में से 10 महीनों में FPI ने भारतीय बाजार से निकासी की है।
इस दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 8 फीसदी तक कमजोर हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब विदेशी निवेशक इक्विटी और बॉन्ड दोनों बाजारों से पैसा निकालते हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है, जिससे रुपये पर सीधा दबाव पड़ता है।
तीसरा जोखिम: Dollar की बढ़ती मांग और आयातकों का दबाव
रुपये की गिरावट का तीसरा प्रमुख कारण डॉलर की भारी खरीदारी है। स्थानीय कंपनियां और आयातक अपने साल के अंत के भुगतान पूरे करने के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर खरीद रहे हैं। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग तेज हो गई है और रुपये की स्थिति और कमजोर हो गई है।
हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बाजार में हस्तक्षेप किया है, लेकिन केंद्रीय बैंक ने रुपये के लिए कोई स्पष्ट लक्ष्य स्तर तय नहीं किया है। 16 दिसंबर को RBI करेंसी स्वैपिंग के तहत बैंकों से डॉलर खरीदने जा रहा है, जिससे बैंकिंग सिस्टम में हजारों करोड़ रुपये की तरलता आएगी। इससे रुपये को कुछ हद तक राहत मिल सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत सीमित और अस्थायी हो सकती है।
रुपये का भविष्य क्या कहता है बाजार?
कोटक सिक्योरिटीज के करेंसी एंड कमोडिटी हेड अनिंद्या बनर्जी के अनुसार, बॉन्ड और इक्विटी दोनों में विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के कारण USD-INR पर दबाव बना हुआ है। वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और Dollar व जापानी येन के कैरी ट्रेड के अनवाइंडिंग से भारतीय बॉन्ड बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर समय-समय पर सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं, जिससे रुपये को बीच-बीच में राहत मिल सकती है। कुल मिलाकर, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि निकट भविष्य में USD-INR का दायरा 89.50 से 91.00 के बीच रह सकता है।
निष्कर्ष: दबाव में रुपया, नजर नीतिगत फैसलों पर
फिलहाल रुपया कई मोर्चों से दबाव झेल रहा है। अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की अनिश्चितता, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और डॉलर की बढ़ती मांग ने मिलकर भारतीय मुद्रा को कमजोर कर दिया है। आने वाले दिनों में रुपये की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक संकेत, नीतिगत फैसले और विदेशी निवेश का रुख कैसा रहता है।
जब तक इन कारकों पर स्पष्टता नहीं आती, तब तक रुपये में तेज मजबूती की उम्मीद कम ही नजर आ रही है।
