जीवदया श्रावक का सर्वोच्च धर्म — जेएसजी सेंट्रल की ‘जीव आहार योजना’ में उमड़ा सेवा भाव
जैन धर्म में जीवदया को श्रावक का सर्वोच्च नैतिक कर्तव्य माना गया है। मूक पशु-पक्षियों की सेवा को जैन संस्कृति में दया, करुणा और अहिंसा का सर्वोच्च रूप कहा गया है। इसी मूल भावना को सार्थक करते हुए जेएसजी सेंट्रल सामाजिक प्रकल्पों के साथ-साथ जीवदया के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सेवाकार्य कर रही है। संस्था नियमित रूप से ‘जीव आहार योजना’ संचालित कर समाज में दया और परोपकार के मूल्यों को मजबूत बना रही है।
जीवदया – जैन श्रावक का प्रमुख धर्म
जीव आहार योजना के अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अध्यक्ष संजय सुराणा ने कहा कि जीवदया केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जैन परिवारों में अत्यंत महत्वपूर्ण धर्म माना गया है। जैन आगमों में श्रावक के कर्तव्यों में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि हर व्यक्ति को मूक प्राणियों के भोजन-पानी, देखरेख और सुरक्षा हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिए।
सुराणा ने बताया कि जीवदया के माध्यम से मनुष्य अपनी करुणा को क्रियाशील बनाता है। “हमारे द्वारा किया गया एक-एक दाना, एक-एक आहार मूक जीवों के जीवन को बचाता है और हमारे जीवन में पुण्य व आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है,” उन्होंने कहा।
हर माह संचालित होती है ‘जीव आहार योजना’
अध्यक्ष संजय सुराणा ने बताया कि जेएसजी सेंट्रल की ‘जीव आहार योजना’ का उद्देश्य समाज के सदस्यों को जीव सेवा के लिए नियमित रूप से जोड़ना है।
यह योजना प्रत्येक माह संचालित होती है, जिसमें पशु-पक्षियों को भोजन, दाना, पानी एवं आवश्यक सेवाएँ प्रदान की जाती हैं।
उन्होंने कहा,
“हम इस योजना के माध्यम से अपने सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों का पूर्ण रूप से पालन कर रहे हैं। जीवों की सेवा कर हम न केवल उनकी रक्षा कर रहे हैं, बल्कि अहिंसा और करुणा के सिद्धांतों को भी जीवन में उतार रहे हैं।”
नवंबर माह – स्व. श्रीमती सुशीलादेवी दासोत की पुण्य स्मृति को समर्पित
नवंबर माह की जीव आहार सेवा स्वर्गीय श्रीमती सुशीलादेवी जी दासोत की पुण्य स्मृति में संपन्न हुई। इस अवसर पर संजय दासोत परिवार द्वारा गोशाला में गायों को आहार कराया गया और पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था की गई।
परिवार ने यह सेवा कार्य दिवंगत सुशीलादेवी जी की आत्मा की शांति और उनकी करुणामयी जीवन दृष्टि को समर्पित किया। यह क्षण भावपूर्ण था, जिसमें परिवारजनों और समाज के सदस्यों ने जीवदया के माध्यम से पुण्य संचय का संकल्प दोहराया।
सदस्यों की उपस्थिति — सेवा संस्कारों का प्रतीक
इस पुण्य अवसर पर बड़ी संख्या में समिति सदस्य उपस्थित रहे। इनमें प्रमुख रूप से —
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संजय सुराणा (अध्यक्ष)
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संजय आचलिया (नवकार, पूर्व अध्यक्ष)
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अशोक मेहता
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शेखर नाहर
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ललित जैन
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सुरेंद्र कोलन
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सौरभ मेहता
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नरेश मारवाड़ी
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सौरभ दुगढ
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रोहित चोरडिया
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प्रतीक डूंगरवाल
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आदर्श दख
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अक्षत हिंगड़
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रीना हिंगड़
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सुहानी भंडारी
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हंसा सुराणा
आदि सदस्य मौजूद रहे।
सभी सदस्यों ने अपनी उपस्थिति से यह संदेश दिया कि जीव सेवा केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज की सतत जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम संचालन एवं जानकारी
कार्यक्रम का संचालन जीव आहार योजना संयोजक रोहित चोरडिया ने किया। उन्होंने पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करते हुए जीवों की सेवा के महत्व पर प्रकाश डाला।
पूरे कार्यक्रम की जानकारी मीडिया प्रभारी राजेश हिंगड़ द्वारा प्रदान की गई।
जीवदया – सामाजिक सौहार्द का पवित्र संदेश
जैन समाज से निकलने वाला जीवदया का यह संदेश केवल जैन समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए प्रेरणास्रोत है।
आज के समय में, जब पशु-पक्षियों के प्राकृतिक संसाधन और सुरक्षा लगातार चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, ऐसे में जेएसजी सेंट्रल द्वारा संचालित ‘जीव आहार योजना’ न केवल जीवों के पोषण की व्यवस्था करती है, बल्कि समाज के भीतर दया, करुणा और नैतिक आचरण के मूल्यों को भी मजबूत बनाती है।
अहिंसा, सह-अस्तित्व और सर्वजीव कल्याण की इस पवित्र परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संस्था ने पुनः यह साबित किया है कि जीवदया ही सच्चा धर्म है — और यही मानवीय संवेदना का सर्वोच्च रूप भी।

