पद्मपुराण आधारित जैन रामकथा का उल्लेखनीय समापन – कोटा में हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ भव्य सम्मान समारोह
कोटा (राजस्थान)। रामपुरा स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर एवं अकलंक स्कूल परिसर में आयोजित श्री रविषेणाचार्य विरचित पद्मपुराण आधारित जैन रामकथा का दस दिवसीय आयोजन हर्ष, उमंग और आध्यात्मिक दिव्यता से परिपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। जैन समाज के विशिष्ट रामकथाकार, अनुष्ठान विशेषज्ञ, धर्म-चक्रकर्ती, ध्यान-दिवाकर मुनिप्रवर श्री जयकीर्ति जी गुरुदेव की अमृतवाणी से कोटा शहर दस दिनों तक धर्ममय रहा।
राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी एवं वरिष्ठ पत्रकार पारस जैन “पार्श्वमणि” ने बताया कि निरंतर दस दिनों तक चले इस आयोजन में कोटा सहित आसपास के क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहीं। मुनिप्रवर जी ने जैन रामकथा के माध्यम से भगवान राम, लक्ष्मण, सीता एवं विभीषण आदि के दिव्य चरित्रों का वर्णन करते हुए पद्मपुराण में वर्णित गूढ़ आध्यात्मिक संदेशों को सरल भाषा में समझाया।
मां जिनवाणी की पालकी यात्रा—धर्ममय परंपरा का अनुपम दृश्य
समापन दिवस पर आयोजित समारोह में मां जिनवाणी को भव्य पालकी में विराजित करने का सौभाग्य
महेंद्र कुमार जैन–श्रीमती मुन्नी जैन,
अतुल–शानू–लक्षिता पाटनी परिवार
को प्राप्त हुआ।
उसी प्रकार राजा श्रेणिक का रूप धारण करने का सौभाग्य
ऋषभ जैन–श्रीमती सुनीता जैन चांदवाड़ परिवार
को मिला।
गुरुदेव का पाद प्रक्षालन—युवाओं की भक्ति का अनूठा उदाहरण
समारोह में अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद – शाखा कोटा की टीम ने मुनिप्रवर श्री जयकीर्ति जी गुरुदेव का पाद प्रक्षालन कर अपनी भक्ति एवं समर्पण भाव प्रदर्शित किया। युवा पीढ़ी का यह योगदान पूरे आयोजन का आकर्षण बना।
सेवा देने वाले श्रावक श्रेष्ठियों का सम्मान
आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी श्रावक-श्राविकाओं का विशेष अभिनंदन एवं सम्मान किया गया।
अकलंक एसोसिएशन के अध्यक्ष पीयूष जैन बज, सचिव अनिमेष जैन,
अकलंक स्कूल स्टाफ,
महावीर–ललित–नवीन लुहाड़िया परिवार,
महाराष्ट्र से आए संगीतकार विद्या सागर जैन,
दस दिवसीय आयोजन का दायित्व संभालने वाले पुण्यार्जक परिवार,
फोटो ग्राफर संमति जैन–सन्मति पाटनी,
सहित अनेक सहयोगियों को मुनिप्रवर जी ने अपने करकमलों से तिलक लगाकर “राम सूत्र” प्रदान किया।
मंगलाचरण और भक्ति नृत्य ने बांधा समापन समारोह का वातावरण
समारोह में राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” ने “धर्म हो सच्चा साथी है, जैसे दीपक बाती है…” जैसे भावपूर्ण मंगलाचरण पाठ से उपस्थित समाजजनों को भावविभोर कर दिया।
अकलंक स्कूल की दो बालिकाओं ने भक्तिभाव से परिपूर्ण नृत्य प्रस्तुत कर भक्तिमय वातावरण को और दिव्य बनाया।
मुनिप्रवर श्री जयकीर्ति जी गुरुदेव का प्रेरणादायक संदेश
समापन अवसर पर मुनिप्रवर श्री जयकीर्ति जी ने कहा—
“जो मनुष्य भगवान राम जैसे उत्तम चरित्रों को श्रद्धा से सुनते हैं, उनके चिरसंचित पापकर्म हजार टुकड़ों में नष्ट हो जाते हैं। विवेकी पुरुषों को चाहिए कि वे अशुभ कर्मों का क्षय करने हेतु इस परम पवित्र चरित्र का पठन-पाठन अवश्य करें।”
गुरुदेव ने रामकथा के विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि:
-
राम, लक्ष्मण और सीता ने महेन्होदय उद्यान में जाकर सर्वभूषण केवली भगवान से धर्मोपदेश सुना।
-
विभीषण की जिज्ञासाओं को शांत करते हुए भगवान राम ने अपने पूर्वभवों का वर्णन किया।
-
कृतान्त क्क्र सेनापति पूर्व जन्मों के प्रसंग सुनकर विरक्त हो गए और जिनदीक्षा के लिए तत्पर हुए।
-
राम ने उनसे कहा—“यदि इस भव में निर्वाण प्राप्त करो तो उत्तम, यदि देव पर्याय पाओ तो कठिन समय में मुझे प्रबोधन अवश्य देना।”
जीवन की अनित्यता और वैराग्य के गम्भीर संदेश
गुरुदेव ने भामण्डल राज्य के राजा के प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा—
मनुष्य संसार में “यह करूँगा, वह करूँगा…” सोचता रहता है,
परंतु “मैं मरूँगा” – यह नहीं सोचता।
उन्होंने हनुमान के ‘कर्णकुंडल नगर’ में जिनमंदिर दर्शन, 750 राजाओं के साथ उनके जिनदीक्षा ग्रहण और मोक्ष प्राप्ति जैसे अत्यंत प्रेरक प्रसंग प्रस्तुत किए।
राम–लक्ष्मण का अटूट बंधन: देवों द्वारा दी गई सूचना और वैराग्य का उद्भव
सोर्मधर्म इंद्र से राम–लक्ष्मण के अटूट प्रेम की कथा सुन कर दो देव क्रीड़ा-वश लक्ष्मण को राम की मृत्यु का झूठा समाचार दे देते हैं। सूचना सुनते ही रामानुरागी लक्ष्मण प्राण त्याग देते हैं।
देवगण पश्चाताप करते हैं और राम को सांत्वना देते हैं।
शोक में डूबे लव–कुश वैराग्य से दीक्षा धारण कर लेते हैं।
राम द्वारा मृत लक्ष्मण को जीवित करने के लिए बालकवत प्रयास—संगीत सुनाना, सजाना, स्नान कराना—समस्त प्रसंगों ने सभा को भावुक कर दिया।
राम का घोर तप और केवलज्ञान की प्राप्ति
जटायु एवं कृतान्तवक्र देव पर्याय में राम को प्रबोधित कर उनके शोक का निवारण करते हैं।
तत्पश्चात राम सुग्रीव व अन्य राजाओं के साथ जिनलिंग धारण कर गुरुवर की अनुमति से एकाकी विहार करते हैं।
उनके अद्वितीय तप, संयम, ध्यान और साधना का वर्णन करते हुए मुनिप्रवर जी ने कहा—
“कलिकाल का मनुष्य राम मुनि के समान घोर तपना तो दूर, उसका ध्यान भी नहीं कर सकता।”
सीता का जीव—सीतेन्द्र—माया, रूप, मोहादि के माध्यम से योगिराज राम का ध्यान भंग करने का प्रयास करता है, परंतु असफल रहता है।
अंततः राम को केवलज्ञान की दिव्य विभूति प्राप्त होती है।
सीतेन्द्र भगवान के चरणों में क्षमा माँगता है।
दस दिवसीय जैन रामकथा का दिव्य उपसंहार
समापन अवसर पर गुरुदेव ने कहा—
“जो भी इस चरित्र को श्रद्धा से पढ़ता-सुनता है, उसे अनुपम फल प्राप्त होता है। यह कथा संसार के समस्त जीवों का कल्याण करने वाली है।”
गुरुदेव ने भवतु सव्व मंगलम् के साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की मंगलभावना व्यक्त की।
प्रस्तुति
पारस जैन “पार्श्वमणि” पत्रकार
कोटा
📞 9414764980



