मंगलगिरी में भव्य आर्यिका जैनेश्वरी दीक्षा समारोह संपन्न
राजेश जैन दद्दू, सागर/इंदौर।
29 नवम्बर। अतिशय क्षेत्र मंगलगिरी, सागर में श्री मज्जिनेंद्र जिनबिंब पंच कल्याणक सप्त गजरथ महामहोत्सव के अवसर पर आयोजित आر्यिका जैनेश्वरी दीक्षा समारोह अतिशय भव्यता और आध्यात्मिक उत्साह के साथ संपन्न हुआ। यह दिव्य आयोजन सकल दिगंबर जैन समाज, श्रमण संस्कृति के महामहिम पट्टाचार्य आचार्य विशुद्धसागर महाराज ससंघ, तथा स्यादवाद शिक्षण परिषद ट्रस्ट के संयुक्त तत्वाधान में हुआ।
भव्य समारोह में आर्यिका 105 विजिज्ञा श्री माताजी के करकमलों से दीक्षा संपन्न
इस पावन अवसर पर आर्यिका 105 विजिज्ञा श्री माताजी के करकमलों से दो ब्रह्मचारिणियों – ब्रह्मचारिणी रूबी दीदी और ब्रह्मचारिणी सरस्वती दीदी – को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान की गई।
दोनों दीक्षार्थियों ने श्रद्धापूर्वक महामहिम आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज से दीक्षा अंगीकार करने की निवेदन भरी प्रार्थना रखी, जिसे आचार्य श्री ने मंगलमय आशीर्वाद के साथ स्वीकार किया। इसके बाद आर्यिका विजिज्ञाश्री माताजी ने दीक्षा संस्कार पूर्ण कर उन्हें मोक्षमार्ग के नियमों से अवगत कराया।
इस अनुष्ठान के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने ओजपूर्ण वातावरण में दीक्षा का अनुमोदना किया और दीक्षार्थी बहनों को मोक्षमार्ग की दिशा में दृढ़ता प्रदान करने हेतु शुभकामनाएँ दी।
जैन गणित की पुस्तक की प्रथम प्रति आचार्य श्री को समर्पित
समारोह के दौरान धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने जानकारी दी कि इस पावन अवसर पर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर के भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के मुख्य अन्वेषक एवं गणित विज्ञानी प्रो. अनुपम जैन द्वारा लिखित शोधपरक पुस्तक ‘जैन गणित’ की प्रथम प्रति आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज को समर्पित की गई।
यह पुस्तक जैन आगमों एवं प्राचीन गणितीय परंपराओं पर आधारित है, जो आधुनिक शिक्षा प्रणाली में जैन दर्शन के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को स्थापित करने का महत्वपूर्ण प्रयास है।
आचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा— श्रमण परंपरा आज भी प्रासंगिक
दीक्षा समारोह को संबोधित करते हुए पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि श्रमण संस्कृति और दिगंबर परंपरा के सिद्धांत पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के समय से चले आ रहे हैं। उन्होंने कहा—
“वैराग्य का मार्ग जीवन को मोक्ष की ओर ले जाने वाला प्रकाश है। आत्म कल्याण के लिए दीक्षा का मार्ग सर्वोत्तम है। जो भी जीव इस पथ पर चलता है, वह संसार बंधनों से मुक्त होने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाता है।”
आचार्य श्री ने श्रावक-श्राविकाओं से आग्रह किया कि जीवन में उत्तम चर्या, संयम और सच्चे आचरण को अपनाकर जैन धर्म के मूल सिद्धांतों की रक्षा और संवर्धन करें।
संपूर्ण भारत से आए श्रद्धालुओं ने दिया अनुमोदना
मंगलगिरी में आयोजित इस जैनेश्वरी दीक्षा समारोह में देशभर के विभिन्न राज्यों से समाजजन, मुनि-महाराज, आर्यिकाएँ, ब्रह्मचारिणी संघ और हजारों की संख्या में दिगंबर जैन समाज के लोग उपस्थित रहे।
पूरे समारोह के दौरान मंत्रोच्चार, आशीष प्रवचन, भजन और दीक्षा संस्कारों ने माहौल को पूर्णतः आध्यात्मिक एवं भावनात्मक बना दिया।
समाज के वरिष्ठ जनों ने कहा कि ऐसी दिव्य दीक्षाएँ न केवल समाज को आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा देती हैं, बल्कि युवाओं में भी जैन धर्म के प्रति श्रद्धा, अध्ययन और संयम की भावना जागृत करती हैं।
