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मुफ्त रेवड़ियां और फ्रीबीज राजनीति: कैसे चुनावी वादे, बिहार चुनाव freebies और रेवड़ी कल्चर राज्यों की आर्थिक स्थिति बिगाड़ रहे हैं

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Published On: 28 November 2025
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मुफ्त रेवड़ियों से जीत सकते हैं चुनाव, लेकिन देश नहीं बनता: जानें कैसे ‘फ्रीबीज’ राज्यों के लिए बन रही हैं गले की फांस

भारत की राजनीति में मुफ्त की रेवड़ियों का कल्चर तेजी से बढ़ रहा है। चुनावी मौसम आते ही पार्टियां एक–दूसरे से आगे निकलने की होड़ में मुफ्त ट्रांसफर, सब्सिडी और कैश गारंटी की बरसात कर देती हैं। लेकिन सवाल यही है—क्या फ्रीबीज से चुनाव जीते जा सकते हैं? हां।
क्या फ्रीबीज से देश बन सकता है? बिल्कुल नहीं।

इसीलिए आज भारत में फ्रीबीज राजनीति, उसकी आर्थिक कीमत और एक राष्ट्रीय आचार संहिता (National Code for Freebies) की जरूरत पर जोरदार बहस शुरू हो गई है।

बिहार चुनाव का सबक — प्रतिस्पर्धी पॉपुलिज्म का ‘मास्टरक्लास’

हाल ही में हुए बिहार चुनाव ने यह साफ कर दिया कि फ्रीबीज कैसे चुनावी रणनीति का केंद्र बन चुकी हैं।
NDA सरकार ने चुनाव प्रचार के बीच ही लगभग 1.2 करोड़ महिलाओं को ₹10,000 सीधे ट्रांसफर कर दिए।
इसके जवाब में महागठबंधन ने उससे भी बड़ा दांव खेला—

  • हर महिला को ₹30,000 देने का वादा
  • राज्य के हर घर में एक सरकारी नौकरी

ये वादे इतने बड़े थे कि ऐसा लगा मानो सभी पार्टियों ने मिलकर राज्य की वित्तीय गणित को विराम दे दिया हो।

लेकिन नतीजा क्या निकला?
बड़े–बड़े वादों ने वोटरों पर असर खो दिया। लोग समझ गए कि सबसे उदार सरकार की भी एक सीमा होती है
इस चुनाव ने दिखाया कि जब कई पार्टियां मुफ्त बांटने की रेस में उतरती हैं तो मुफ्त का असर एक-दूसरे को खत्म कर देता है।

मुफ्त की रेवड़ी में छिपा बड़ा खतरा

आज देश में कई राज्य ऐसी गारंटियों की वजह से आर्थिक दबाव में हैं:

आंध्र प्रदेश

चुनावी गारंटियों पर बनी सरकार अब समझ रही है कि वेलफेयर स्कीमें लागू करना उतना आसान नहीं जितना चुनावी रैली में कहना।

तेलंगाना

सालों तक भारी-भरकम मुफ्त योजनाएं चलाने के बाद अब खजाना खाली होने लगा है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक

सोशल ट्रांसफर बढ़ाने के कारण सरकारों के पास डिवेलपमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च करने की जगह घटती जा रही है।

यानी, फ्रीबीज ने राज्यों की आर्थिक लचीलापन खत्म कर दिया है।

PM मोदी भी कर चुके चेतावनी

प्रधानमंत्री मोदी पहले ही ‘रेवड़ी कल्चर’ को लेकर चेतावनी दे चुके हैं कि

ज्यादा मुफ्त बांटना आर्थिक रूप से खतरनाक है।

लेकिन राजनीति का दबाव ऐसा है कि आज हर पार्टी इस रेस में शामिल होने को मजबूर है
यह किसी एक पार्टी की गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की संरचनागत कमजोरी है, जहां चुनावी फायदा हमेशा वित्तीय अनुशासन को मात दे देता है।

मुफ्त बांटना—रोजगार, विकास और सम्मानजनक आय की विफलता का स्वीकार

चीनी नेता माओ का मशहूर कथन बेहद सटीक बैठता है—

किसी को मछली दोगे तो एक दिन खिलाओगे,
मछली पकड़ना सिखाओगे तो जीवन भर।

भारतीय राजनीति में असल संदेश यह है—
“हम आपको सम्मानजनक नौकरी और स्थिर आय नहीं दे सकते, इसलिए फिलहाल यह फ्री लाभ ले लो।”

मुफ्त योजनाओं ने नेताओं का फोकस रोजगार, स्किल, प्रोडक्टिविटी, शिक्षा और ह्यूमन कैपिटल से हटाकर बस एक दिन का संतोष देने वाली योजनाओं पर टिकाकर रख दिया है—
कि 10,000 दें या 30,000?

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फ्रीबीज का बिल कौन भर रहा है?

सबसे खतरनाक पहलू यह है कि लगभग सभी फ्रीबीज उधार लेकर फंड की जा रही हैं।
यानी,
आज का खर्च = कल के टैक्सपेयर पर बोझ

जब सरकारें:

  • कैश ट्रांसफर के लिए कर्ज लेती हैं
  • सब्सिडी बढ़ाने के लिए बॉन्ड बेचती हैं
  • बजट से बाहर उधारी करती हैं

तो इसका असर आने वाले वर्षों की इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार सृजन पर पड़ता है।

सिस्टम क्यों फेल है?

1. विपक्ष — गरीब विरोधी न दिखने का डर

कोई भी पार्टी मुफ्त योजनाओं की आलोचना नहीं करती।
डर यह कि वोट खो जाएंगे या गरीब-विरोधी टैग लग जाएगा।

2. CAG — देर से आने वाली रिपोर्टें

ऑडिट रिपोर्ट तब आती हैं जब फ्रीबीज चुनाव जीतने का काम कर चुकी होती हैं।
तब तक रिपोर्ट बेअसर हो जाती है।

3. मार्केट—मान लेता है कि केंद्र बचा लेगा

निवेशक जानते हैं कि राज्य डिफॉल्ट करेगा तो केंद्र बचाव में आ जाएगा।
इससे वित्तीय अनुशासन कमजोर होता जाता है।

4. चुनाव आयोग — उसकी भूमिका सीमित है

EC सिर्फ चुनावी आचार संहिता संभाल सकता है,
सरकारी खर्च नहीं
उसे वेलफेयर पॉलिटिक्स में घसीटना सही नहीं।

तो क्या वेलफेयर गलत है?

बिल्कुल नहीं।

भारत जैसे देश में जहाँ करोड़ों लोग गरीबी और अनिश्चित आय से जूझते हैं,
सोशल सिक्योरिटी और वेलफेयर स्कीमें जरूरी हैं।

समस्या सिर्फ तब आती है जब:

  • वेलफेयर स्कीमें आर्थिक क्षमता से ज्यादा हों
  • उनका लक्ष्य विकास नहीं, सिर्फ चुनाव जीतना हो
  • उन्हें बिना राजस्व स्रोत बताए लागू किया जाए
  • उन्हें उधार लेकर फाइनेंस किया जाए

जब मुफ्त योजनाएं मानव विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार को पीछे छोड़ देती हैं, तब यह गले की फांस बन जाती हैं।

वोटर क्या चाहते हैं?

बिहार चुनाव का सबक यह है—

वोटर तुरंत लाभ लेते हैं,
लेकिन वे यह भी जानते हैं कि
नेताओं की क्रेडिबिलिटी कमजोर हो चुकी है

जब भरोसा नहीं बचता,
तो लोग मुफ्त योजनाओं को ही सबसे सुरक्षित विकल्प मानते हैं।

समाधान—फ्रीबीज पर नेशनल कोड ऑफ कंडक्ट

अब जरूरत है कि केंद्र सरकार आगे आए और मुफ्त योजनाओं पर एक राष्ट्रीय नीति बनाए।
इस कोड में होना चाहिए—

1. फ्रीबीज पर अधिकतम खर्च की सीमा

राज्यों को बताना होगा कि जीडीपी का कितना हिस्सा मुफ्त योजनाओं में लगाया जा सकता है।

2. चुनाव से पहले मुफ्त योजनाओं की घोषणा पर रोक

कम से कम चुनावी 6 महीने पहले कोई नई स्कीम घोषित न हो।

3. हर पार्टी को बताना होगा—पैसा कहां से आएगा

कर्ज से फंड की गई योजना की घोषणा पर सख्ती हो।

4. पारदर्शिता—बजट के भीतर ही सब खर्च शामिल हों

बजट के बाहर उधारी से फ्रीबीज चलाने पर रोक लगे।

5. वेलफेयर और फ्रीबीज में स्पष्ट अंतर

  • वेलफेयर = विकास, मानव पूंजी, रोजगार

  • फ्रीबीज = तत्काल लाभ, चुनावी फायदा

निष्कर्ष—देश फ्रीबीज से नहीं, दीर्घकालिक विकास से बनता है

भारत को गरीबों की सहायता चाहिए,
लेकिन वह सहायता उत्पादक और स्थायी होनी चाहिए।

मुफ्त की रेवड़ियां चुनाव जिता सकती हैं,
लेकिन वे देश को मजबूत नहीं बना सकतीं।

वक्त आ गया है कि—

  • राजनीतिक ईमानदारी वापस आए
  • वित्तीय अनुशासन लौटे
  • और जनता को ऐसा सिस्टम मिले
    जहाँ सम्मानजनक रोजगार, कौशल, और बेहतर अवसर मुफ्त की रेवड़ियों से ऊपर हों।
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