उदारसागर जनकल्याण तीर्थ पर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का शुभारंभ: गर्भ कल्याणक (पूर्वार्ध) महोत्सव में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
घुवारा/बड़ागांव।
उदार सागर जनकल्याण तीर्थ पर आयोजित श्री मज्जिनेन्द जिन बिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का शुभारंभ परम पूज्य ज्ञान रत्नाकर आचार्य श्री 108 उदार सागर जी महाराज ससंघ के पावन सानिध्य में अत्यंत भव्यता एवं दिव्यता के साथ हुआ। 23 नवंबर से 30 नवंबर तक चलने वाले इस विशाल धार्मिक आयोजन के प्रथम दिवस पर गर्भ कल्याणक (पूर्वार्ध) महोत्सव की पावन विधियाँ संपन्न हुईं, जिसमें देशभर के अनेक प्रांतों से हजारों धर्मावलंबियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
सुबह 6:30 बजे देव-गुरु आज्ञा एवं घटयात्रा के साथ हुआ शुभारंभ
पहली प्रभात किरण के साथ ही तीर्थ परिसर में आध्यात्मिक माहौल छा गया।
प्रातः 6:30 बजे देव आज्ञा, गुरु आज्ञा और भव्य घटयात्रा के साथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का आरंभ हुआ। भक्तों द्वारा कलशों के साथ किए गए मंगलगान, ढोल-नगाड़ों की गूंज, और जय-जयकारों ने वातावरण को पूर्णतः आध्यात्मिक बना दिया।
इसके पश्चात 8:24 बजे ध्वाजारोहण, पंडाल उद्घाटन, प्रतिष्ठाचार्य निमंत्रण और बेदी शुद्धि संस्कार सम्पन्न हुए। नयनाभिराम सजावट से सुसज्जित मंडप में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार उमड़ती रही।
आचार्य श्री का मागांलिक प्रवचन: धर्म, दया और साधना पर विशेष उद्बोधन
9:15 बजे आचार्य श्री 108 उदार सागर जी महाराज के मंगलमय प्रवचन सम्पन्न हुए।
उन्होंने गर्भ कल्याणक के आध्यात्मिक महत्व, अहिंसा और सदाचार की भूमिका, तथा पंचकल्याणक की दिव्य परंपरा पर गहन प्रकाश डाला। उनके उपदेशों ने श्रोताओं को धर्ममय जीवन की ओर प्रेरित किया।
सकलीकरण, इंद्र प्रतिष्ठा और नांदी विधान सम्पन्न
प्रवचन के बाद सकलीकरण, इंद्र प्रतिष्ठा और नांदी विधान की पावन विधियाँ सम्पन्न हुईं।
इन वैदिक-जैन धार्मिक क्रियाओं ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जाओं से भर दिया। आयोजन स्थल पर मंत्रोच्चार और शास्त्रीय संगीत की ध्वनि देर तक गूंजती रही।
विशिष्ट अतिथियों ने किए महत्वपूर्ण अनुष्ठान
आयोजन में विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे प्रतिष्ठित जनों ने अपने सौभाग्य से धार्मिक क्रियाओं में सहभागिता की—
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ध्वाजारोहण: श्री ऋषभ कुमार जी चंदेरिया द्वारा
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दीप प्रज्वलन: बड़ागांव गौरव व उमरिया कलेक्टर श्री धर्णेन्द्र जैन द्वारा
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चित्र अनावरण: बड़ागांव तहसीलदार श्री पलक जैन द्वारा
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मंडप उद्घाटन: सिंघई पदमचंद जी बांसा द्वारा
इन अनुष्ठानों से महोत्सव की गरिमा और अधिक बढ़ गई।
याज्ञ मंडल विधान में उमड़ा भक्तों का जनसैलाब
दोपहर 1:00 बजे से याज्ञ मंडल विधान शुरू हुआ।
पूरे पंडाल में भक्तों ने बड़ी श्रद्धा और अनुशासन के साथ धर्मविधियों में भाग लिया।
सैकड़ों श्रावक-श्रेणिकाओं ने मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ में अपनी सहभागिता दर्ज की।
सुबह से ही आसपास के जिलों, मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित कई प्रांतों से धर्मप्रेमियों के आने का सिलसिला लगातार जारी रहा।
आयोजन समिति द्वारा भोजन, आवास और पेयजल की अत्यंत उत्कृष्ट व्यवस्थाएँ की गई थीं, जिनकी सभी आगंतुकों ने प्रशंसा की।
शाम को महाआरती, शास्त्र प्रवचन और इंद्र दरबार
पूरे दिन की दिव्य क्रियाओं के बाद संध्या समय का कार्यक्रम अत्यंत मनमोहक रहा।
7:00 बजे – महाआरती
तीर्थ परिसर में सामूहिक महाआरती का आयोजन हुआ।
सैकड़ों दीपों की लौ तथा घंटा-घड़ियाल की ध्वनि से वातावरण पूर्णतः आध्यात्मिक हो गया।
भक्तों के स्वर में गूंजते आरती गीत ने पूरे माहौल को अलौकिक बना दिया।
7:45 बजे – शास्त्र प्रवचन
इसके बाद शास्त्रों पर आधारित प्रवचन हुए, जिनमें आचार्यों ने धर्म, शील और तप की महानता पर प्रकाश डाला।
8:30 बजे – इंद्र दरबार, तत्व चर्चा एवं माता की सेवा
रात्रि कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा—
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इंद्र दरबार का भव्य मंचन
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तत्व चर्चा
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माता की सेवा एवं गर्भावतरण की धार्मिक क्रियाएँ
इन कार्यक्रमों ने पंचकल्याणक की पौराणिक परंपरा को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
विशेषकर गर्भावतरण की विधि का दृश्य अत्यंत भावविभोर कर देने वाला रहा, जिसे देखकर श्रद्धालु भावविह्वल हो उठे।
तीर्थ परिसर में उत्सव जैसा माहौल
पूरा परिसर रंग-बिरंगी रोशनी, पुष्प सज्जा और दिव्य कलाकृतियों से सजा था।
विधानों के दौरान पूरे क्षेत्र में पवित्र मंत्रों की ध्वनि निरंतर गूंज रही थी।
व्यवस्था, सुरक्षा, समयानुसार कार्यक्रम प्रवाह—सब कुछ सुव्यवस्थित और अनुशासित रहा।
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा—एक सप्ताह तक जारी रहेंगे दिव्य आयोजन
आयोजन समिति के अनुसार 23 से 30 नवंबर तक जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक सहित कई दिव्य विधान संपन्न होंगे।
श्री मज्जिनेन्द जिन बिम्ब प्रतिष्ठा का यह महोत्सव क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक और अविस्मरणीय बनने जा रहा है।
समापन
उदारसागर जनकल्याण तीर्थ पर आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का गर्भ कल्याणक (पूर्वार्ध) दिन अत्यंत सफल, भव्य और दिव्य उत्सव के रूप में संपन्न हुआ।
आचार्य श्री उदार सागर जी ससंघ के अद्वितीय नेतृत्व और धर्मप्रेमी समाज की सहभागिता ने इसे आध्यात्मिकता और भव्यता का अद्भुत संगम बना दिया।


