निवाई नगरी में धर्म की गंगा बहेगी: 18 नवंबर 2025 को परम पूज्य आचार्य वर्धमान सागर महाराज संध का मंगल प्रवेश, 26 पिच्छीधारी तपस्वी संत करेंगे पदार्पण
प्रस्तुति: राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि”, कोटा
निवाई। धर्म, अहिंसा और तप की अद्भुत धारा से सराबोर होने जा रही है राजस्थान की पावन नगरी निवाई, जहाँ 18 नवंबर 2025 को परम पूज्य राष्ट्रीय संत वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्धमान सागर महाराज संध का भव्य मंगल प्रवेश होने जा रहा है। इस पावन अवसर पर आचार्य श्री के साथ लगभग 26 पिच्छीधारी त्यागी तपस्वी दिगम्बर जैन संतों का दिव्य सान्निध्य निवाई को प्राप्त होगा। यह आगमन केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, साधना और शांति का अद्वितीय संगम होगा, जिसकी प्रतीक्षा पूरे जैन समाज को बेसब्री से है।
निवाई के लिए यह समय किसी धर्म पर्व से कम नहीं। कहा जाता है कि असंख्य जन्मों का पुण्य उदय एक साथ फलित हो तभी इतने विशाल संत समूह का सान्निध्य एक नगर को प्राप्त होता है। रक्तांअचल पर्वत की सुरम्य वादियों में बसी यह धर्म प्राण नगरी अपने आप में सौभाग्यशाली है, जहाँ इतने विशाल संत समुदाय का पदार्पण एक ऐतिहासिक घटना बनने जा रहा है।
आचार्य वर्धमान सागर महाराज संध का प्रवास कार्यक्रम
जैन समाज के प्रवक्ता विमल जौंला एवं सुनील भाणजा ने राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन “पार्श्वमणि” को जानकारी देते हुए बताया कि आचार्य श्री का शीतकालीन प्रवास निवाई में रहेगा। यह प्रवास आध्यात्मिक रूप से समूचे क्षेत्र के लिए अत्यंत शुभ संकेत माना जा रहा है।
मीडिया प्रभारी के अनुसार, आचार्य संध 15 नवंबर को टोंक से मंगल विहार करते हुए सोहेला–बरुणी पहाड़ी मार्ग से अग्रसर होंगे। 17 नवंबर को आचार्य श्री का कल्याण कॉलेज, निवाई में ठहराव निर्धारित है। वहां से 18 नवंबर की सुबह वह पदविहार करते हुए निवाई शहर में दिव्य मंगल प्रवेश करेंगे।
इस दौरान भक्तगण, श्रद्धालु, बालक-बालिकाएँ, महिला मण्डल तथा विभिन्न धार्मिक संगठन ढोल-ढमाल, ध्वज, बैनर और पुष्प वर्षा के साथ आचार्य श्री की अगवानी करने के लिए तैयार हैं। निवाई शहर के प्रमुख मार्गों को धार्मिक रंगों से सजाया जाएगा, जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक आभा से भर उठेगा।
निवाई के प्रमुख मार्गों से भव्य शोभायात्रा
आचार्य वर्धमान सागर महाराज संध का मंगल प्रवेश एक विशाल शोभायात्रा के रूप में नगर के मुख्य मार्गों से होगा। भक्तजन अपने-अपने स्थानों पर खड़े होकर तपस्वी संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करेंगे।
यह शोभायात्रा निवाई की सामाजिक एकता, धार्मिक उत्साह और जैन समाज की संगठन क्षमता का एक दिव्य प्रतीक बनेगी।
नगर के प्रमुख विशिष्ट स्थानों पर मंच स्थापित होंगे, जहाँ पर श्रद्धालु आचार्य श्री की प्रत्यक्ष दर्शन–वंदना का लाभ लेंगे।
नगरवासियों का उत्साह इतना है कि कई स्थानों पर आत्मीय स्वागत के लिए विशेष व्यवस्थाएँ की गई हैं।
संत निवास नसियां जैन मंदिर में विशेष समारोह
भव्य मंगल प्रवेश के पश्चात आचार्य संध संत निवास नसियां जैन मंदिर पहुंचेंगे, जहाँ भगवान 1008 शांतिनाथ के समक्ष प्रथम अभिवंदन और तप आराधना होगी।
यहां आचार्य श्री श्रद्धालुओं को धार्मिक उपदेश, जीवन परिवर्तन के सूत्र, अहिंसा का संदेश, तथा संयम-तप की महिमा का अमृतपान कराएंगे।
जैन समाज के विद्वानों का मत है कि आचार्य वर्धमान सागर महाराज जहां भी प्रवास करते हैं, वहाँ का सामाजिक–धार्मिक वातावरण अत्यंत सकारात्मक और अनुशासित हो जाता है। उनके प्रवचन केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों व आत्मानुभूति से निसृत गूढ़ ज्ञान की धारा होते हैं।
शीतकालीन प्रवास का निवाई पर व्यापक प्रभाव
निवाई में इस शीतकालीन प्रवास का प्रभाव अनेक स्तरों पर पड़ेगा—
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धार्मिक जागरण में वृद्धि
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युवाओं में आध्यात्मिकता के प्रति रुचि
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महिला शक्ति का धार्मिक आयोजन में व्यापक योगदान
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सामाजिक एकता और समरसता
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नैतिकता, संयम और शुद्ध आचार के प्रति जागृति
निवाई के वरिष्ठ नागरिकों एवं सामाजिक नेताओं ने इसे शहर के लिए सौभाग्य बताया है। पूरे शहर में उत्साह का माहौल है और समाज जन इस अवसर को “ऐतिहासिक धर्म पर्व” के रूप में देख रहे हैं।
आचार्य वर्धमान सागर महाराज संध — तप, त्याग और समता की प्रतिमूर्ति
आचार्य वर्धमान सागर जी का व्यक्तित्व स्वयं में अद्भुत है।
उनकी वाणी में करुणा, उनके पग में तप, और उनके जीवन में पूर्ण त्याग की अद्वितीय मिसाल है।
उनके उपदेश में
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अहिंसा
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अनासक्ति
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परिग्रह-त्याग
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सत्य, संयम और समता
का अद्भुत संगम होता है।
यही कारण है कि हजारों-लाखों श्रद्धालु उनसे नियमित रूप से मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं।
जैन समाज की तैयारियाँ चरम पर
इस भव्य आयोजन को लेकर
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जैन समाज के पदाधिकारी
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महिला मंडल
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युवक मंडल
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सेवा समितियाँ
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तथा नगर के नागरिक
सभी मिलकर व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं।
भव्य स्वागत तो होगा ही, साथ ही पानी–छाछ–स्वास्थ्य सेवा, छाया पांडाल, पुष्प वर्षा, पैदल यात्रियों के लिए मार्ग व्यवस्था जैसी सेवाएँ भी सुनिश्चित की जा रही हैं।
अंत में
निवाई में होने वाला यह दिव्य प्रवास केवल जैन समाज के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव समाज के लिए एक आध्यात्मिक प्रेरणा है।
18 नवंबर 2025 का यह दिन निवाई के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो जाएगा।

