मध्य प्रदेश के PWD विभाग के पूर्व अधिकारी गोविंद प्रसाद मेहरा (जीपी मेहरा) के भ्रष्टाचार मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। लोकायुक्त की जांच में पता चला है कि परियोजनाओं की लागत में कुल 17.42 करोड़ रुपये की अनावश्यक वृद्धि हुई। इसके अलावा सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग करके मेहरा के निजी फार्म हाउस और अन्य संपत्तियों तक सड़क बनाई गई। इस मामले के उजागर होने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है और तत्काल प्रभाव से तीन इंजीनियरों को सस्पेंड कर दिया गया है।

10 अक्टूबर को की थी बड़ी कार्रवाई
लोकायुक्त ने इस मामले में 10 अक्टूबर को राजधानी भोपाल में बड़ी कार्रवाई की थी। टीम ने PWD के पूर्व चीफ इंजीनियर जीपी मेहरा के ठिकानों पर छापेमारी की। मन्नीपुरम स्थित आवास, दाना पानी स्थित फ्लैट, सुहागपुर जिले की ग्राम सैनी में बने फार्म हाउस और गोविंदपुरा इंडस्ट्रियल एरिया की फैक्ट्री में एक साथ दबिश दी गई। छापेमारी के दौरान बड़ी मात्रा में संपत्ति और नकदी बरामद हुई।
जांच में सामने आया कि रिटायर्ड इंजीनियर के पास करोड़ों की संपत्ति थी। छापे में लगभग 3 करोड़ 60 लाख रुपये के जेवरात, 36 लाख नगद और 56 लाख की फिक्स्ड डिपॉजिट FD मिले। यह संपत्ति सरकारी पद का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार की गंभीर साजिश का संकेत देती है।
व्यक्तिगत फार्मा हाउस पर बनाई सरकारी खर्च से सड़क :
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जीपी मेहरा के फार्म हाउस तक सरकारी खर्च पर सड़क बनवाई गई, जिससे यह साफ जाहिर होता है कि विभागीय निधियों का व्यक्तिगत लाभ के लिए गलत इस्तेमाल किया गया। इसके अलावा, मामले में आरके मेहरा और बौरासी के नाम पर भी सवाल उठाए गए हैं। फिलहाल लोकायुक्त की टीम मामले की जांच कर रही है और आगे की कार्रवाई का इंतजार किया जा रहा है।
इस मामले से PWD विभाग में कामकाज और परियोजना निगरानी पर भी सवाल उठ रहे हैं। अधिकारियों की लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण राज्य की विकास परियोजनाओं की लागत बढ़ी है। लोकायुक्त ने साफ किया है कि ऐसे मामले को बख्शा नहीं जाएगा और सभी दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
तीन इंजीनियरों की सस्पेंशन के बाद विभाग में गहन आंतरिक जांच शुरू हो गई है। इसके तहत परियोजनाओं के बिल, खरीद प्रक्रिया और निर्माण कार्य की पूरी समीक्षा की जा रही है। लोकायुक्त ने कहा कि भ्रष्टाचार और सरकारी धन का दुरुपयोग किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला मध्य प्रदेश में सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को और उजागर करता है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए सतत निगरानी और समय-समय पर ऑडिट अनिवार्य हैं।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने पहले ही भ्रष्टाचार के मामलों को रोकने और सरकारी निधियों के सही उपयोग के लिए कई उपाय किए हैं। जीपी मेहरा मामला उन उपायों की सफलता और चुनौतियों दोनों को दर्शाता है।
लोकायुक्त की टीम के सूत्रों ने बताया कि मामले की जांच अभी जारी है और जल्द ही अधिकृत रिपोर्ट के आधार पर दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। यह मामला राज्य में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रशासन की सख्ती का उदाहरण भी माना जा रहा है।
