“चाहे हिंदी भाषा क्यों न हो, किसी को बाध्य नहीं कर सकते” — मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज
थूवोनजी दर्शनोदय तीर्थ में ‘महा दानम’ कृति का भव्य विमोचन, विधायक और डिप्टी कलेक्टर हुए शामिल
दर्शनोदय तीर्थ, थूवोनजी की पवित्र भूमि पर आज एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला जब परम पूज्य मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज के सान्निध्य में अर्घमागधी भाषा में लिखी गई अमूल्य कृति ‘महा दानम’ का विमोचन हुआ। इस अवसर पर चंदेरी विधायक जगन्नाथ सिंह रघुवंशी, शिवपुरी के डिप्टी कलेक्टर एम.एल. अमोल, आइजा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव सैनानी, और तीर्थ क्षेत्र कमेटी के वरिष्ठ सदस्य उपस्थित रहे।
“हिंदी को अनिवार्य करना बाध्यकारी नहीं होना चाहिए” — मुनि श्री सुधासागरजी
विमोचन कार्यक्रम के दौरान संबोधित करते हुए मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि भारत की विविधता में एकता ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।
उन्होंने कहा —
“भारत में रहने वाले को मातृभाषा हिंदी बोलनी चाहिए, यह हमारी भावना है; लेकिन किसी को इसके लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। संसद में हिंदी को अनिवार्य करने वाला विधेयक इसलिए विरोध का विषय बन गया क्योंकि किसी चीज़ पर सर्वसम्मति बनाना कठिन है। किसी को मिथ्या या पापी कहना भी उचित नहीं है।”
उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि सोलहवीं सदी में टोडरमल जी को इसी प्रकार की सामाजिक असहमति का परिणाम भुगतना पड़ा था।
मुनि श्री ने आगे कहा —
“जब मांस निर्यात बंद करने के आंदोलन के समय हमने कहा कि मांस खाने वालों को पापी नहीं कहा जा सकता, तो पूरा देश यही सोचने लगा कि क्या हम सब पापी हैं?
एक ही उपाय है – आत्मसंयम और ज्ञान। देश में जो मांस है, वह खुद की खपत से पूरा नहीं हो पा रहा, तो हम दूसरों को कैसे दें?”
उनका यह कथन उपस्थित जनों के लिए आत्मचिंतन का विषय बन गया।
अर्घमागधी भाषा का गौरव पुनर्जीवित
इस अवसर पर विमोचित पुस्तक ‘महा दानम’ के संदर्भ में मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि अर्घमागधी भाषा और ब्राह्मी लिपि भारत की प्राचीनतम भाषाओं में से हैं, जो लगभग दो हजार वर्ष पूर्व व्यापक रूप से प्रचलन में थीं।
उन्होंने कहा —
“आज जब इन भाषाओं पर पुनः शोध और कार्य हो रहा है, यह ज्ञान के विस्तार का संकेत है। भाषा कोई भी हो, उस पर कार्य होना चाहिए। इससे हमारे संस्कृति और विचारधारा को नया आयाम मिलेगा।”
उन्होंने लेखकों और शोधकर्ताओं को इस दिशा में और कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
“दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी – विकास की नई दिशा”
कार्यक्रम में क्षेत्र कमेटी के प्रचार मंत्री विजय धुर्रा ने कहा कि जबसे इस तीर्थ को “दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी” नाम प्राप्त हुआ है, तब से यहां विकास के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं।
उन्होंने बताया —
“आज यहां सैकड़ों यात्रियों के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। यह संभव हुआ है मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज के आशीर्वाद और मार्गदर्शन से।
तीर्थ के विकास में योगदान देने वाला प्रत्येक व्यक्ति वास्तव में धर्म और समाज सेवा का भागीदार है।”
धुर्रा ने समाज से अपील की कि थूवोनजी तीर्थ के सर्वांगीण विकास में सहयोग करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस पवित्र स्थल से प्रेरणा ले सकें।
“राजनीति से सुचिता गायब हो रही है” — विधायक जगन्नाथ सिंह रघुवंशी
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विधायक जगन्नाथ सिंह रघुवंशी ने मुनि श्री के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया और अपने संबोधन में कहा कि वर्तमान समय में राजनीति की सुचिता और पारदर्शिता कम होती जा रही है।
उन्होंने कहा —
“आज जनप्रतिनिधि बनने के बाद बहुत से लोग जनता का ध्यान भूल जाते हैं और अपने स्वार्थ में लिप्त हो जाते हैं।
राजनीति में नैतिकता और जनसेवा का भाव वापस लाने की आवश्यकता है। यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।”
रघुवंशी ने आगे कहा कि मुनि श्री जैसे संत समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य कर रहे हैं। ऐसे अवसरों से समाज में आत्मिक चेतना जागृत होती है।
अतिथियों का सम्मान और स्वागत
कार्यक्रम में आइजा प्रदेश अध्यक्ष राजीव सैनानी, जिला अध्यक्ष गौरव सिन्नी, गायत्री चौधरी, अशोक जैन टींगू मिल, महामंत्री मनोज भैसरवास, कोषाध्यक्ष प्रमोद मंगल दीप, राजेन्द्र हलवाई और जैन समाज संयोजक विजय धुर्रा सहित अनेक गणमान्य अतिथियों का स्वागत किया गया।
सभी अतिथियों का पीत वस्त्र, पगड़ी, मालाओं और स्मृति चिन्हों से सम्मान किया गया।
कार्यक्रम का संचालन तीर्थ कमेटी द्वारा गरिमामय वातावरण में किया गया, जहां श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने माहौल को आध्यात्मिक बना दिया।
धार्मिकता और सामाजिक विकास का संगम
यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक था, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का भी संदेश लेकर आया।
मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि
“जब धर्म और समाज एक साथ चलते हैं, तब ही वास्तविक विकास होता है।
तीर्थ, मंदिर और संस्कृति केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि हमारे मूल्य और आदर्शों के जीवंत केंद्र हैं।”
कार्यक्रम के अंत में मुनि श्री ने समस्त श्रद्धालुओं को सदाचार, संयम और राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर चलने का आशीर्वाद दिया।
निष्कर्ष
दर्शनोदय तीर्थ थूवोनजी का यह आयोजन समाज में आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक समरसता का प्रतीक बन गया।
‘महा दानम’ जैसी कृतियां आने वाली पीढ़ियों को भारतीय भाषा, संस्कृति और नैतिकता के संरक्षण की प्रेरणा देती रहेंगी।
मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज का यह संदेश कि “हम किसी को बाध्य नहीं कर सकते, लेकिन प्रेरित जरूर कर सकते हैं” — आज के समाज के लिए एक गहरा मार्गदर्शन है।

