PM Modi on Ease of Justice: ‘न्याय की भाषा वही हो, जो न्याय पाने वाले को समझ आए’ — पीएम मोदी ने न्याय की सरलता और समानता पर दिया जोर
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को राजधानी दिल्ली में आयोजित ‘वाणिज्य न्यायालयों के स्थायी अंतरराष्ट्रीय मंच’ (Permanent Forum of Commercial Courts) की छठी पूर्ण बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि — “Ease of Justice सुनिश्चित किए बिना Ease of Living और Ease of Doing Business अधूरा है।” उन्होंने इस अवसर पर कानून की भाषा को सरल और आमजन की समझ में आने योग्य बनाने पर विशेष बल दिया।
‘न्याय की भाषा वही होनी चाहिए, जो न्याय पाने वाले को समझ आए’
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि जब तक कानून और न्याय की भाषा आम व्यक्ति की भाषा में नहीं होगी, तब तक “न्याय की पहुँच” अधूरी रहेगी। उन्होंने कहा —
“न्याय की भाषा वही होनी चाहिए, जो न्याय पाने वाले को समझ आए। जब कानून का मसौदा तैयार किया जाता है, तब यह ध्यान रखना चाहिए कि भाषा सरल और जनसुलभ हो। इससे कानून का पालन बढ़ेगा और मुकदमेबाजी कम होगी।”
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि कानूनी दस्तावेज़, आदेश और फैसले स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराना आवश्यक है ताकि न्याय हर व्यक्ति तक पहुँचे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस पहल की सराहना की, जिसमें 80 हजार से अधिक फैसलों का 18 भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। मोदी ने उम्मीद जताई कि यह प्रयास जल्द ही हाईकोर्ट और जिला अदालतों तक भी विस्तारित होगा।
Ease of Justice: न्याय तक आसान पहुँच की जरूरत
प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार ने बीते 11 वर्षों में Ease of Doing Business और Ease of Living पर कई सुधार किए हैं, लेकिन अब समय है कि Ease of Justice को भी उसी प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाया जाए।
उन्होंने कहा —
“जब न्याय सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि देखे बिना हर व्यक्ति तक पहुंचता है, तभी वह सच्चा सामाजिक न्याय कहलाता है। न्याय की सरलता और पहुँच सामाजिक समानता की नींव है।”
उन्होंने बताया कि आज लोक अदालतों, विवादों के प्री-लिटिगेशन समाधान, और कानूनी सहायता रक्षा परामर्श प्रणाली (Legal Aid Defence Counsel System) जैसी पहल ने लाखों लोगों को सस्ती और तेज़ न्याय सेवा उपलब्ध कराई है।
कानूनी जागरूकता — सामाजिक न्याय की पहली सीढ़ी
प्रधानमंत्री ने कहा कि गरीब, वंचित, महिलाएं और बुजुर्ग तब तक न्याय नहीं पा सकते, जब तक उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी न हो। उन्होंने कहा कि कानूनी जागरूकता को बढ़ाना सरकार और न्यायपालिका की साझा जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा —
“एक गरीब व्यक्ति जब तक अपने अधिकार नहीं जानता, तब तक वह न्याय नहीं पा सकता। इसलिए कानून के छात्र और युवा आगे आएं, गाँवों में जाकर लोगों को उनके अधिकार और कानूनी प्रक्रिया समझाएं।”
मोदी ने कहा कि ऐसे प्रयास न केवल समाज में जागरूकता बढ़ाएंगे, बल्कि युवाओं को समाज की नब्ज़ को समझने का अवसर भी देंगे।
सरकार की प्रमुख पहलें: न्याय और सरलता की दिशा में कदम
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने Ease of Doing Business और Ease of Living को सुनिश्चित करने के लिए अनेक कानूनी सुधार किए हैं।
उन्होंने बताया कि —
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40 से अधिक अनुपालनों को समाप्त किया गया है ताकि व्यवसाय करना आसान बने।
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3,400 से अधिक कानूनी धाराओं का गैर-अपराधीकरण (Decriminalization) किया गया है।
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15,000 से अधिक पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को रद्द कर दिया गया है।
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भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) के माध्यम से पुराने कानूनों में सुधार किए गए हैं ताकि वे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप हों।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इन सुधारों से न केवल व्यापार में आसानी आई है बल्कि न्याय प्रणाली में भी पारदर्शिता बढ़ी है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि तीन सालों में ‘कानूनी सहायता रक्षा परामर्श प्रणाली’ के तहत लगभग आठ लाख आपराधिक मामलों का निपटारा किया गया है, जिससे गरीब और वंचित वर्गों को न्याय तक आसान पहुँच मिली है।
भाषाई बाधा तोड़ना — न्याय का लोकतंत्रीकरण
मोदी ने कहा कि भारत जैसे विविध भाषाओं वाले देश में न्याय की प्रक्रिया को बहुभाषी बनाना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा —
“जब कानून की भाषा सरल और अपनी हो, तो उसका अनुपालन स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। भाषा को सरल बनाना न केवल कानूनी सुधार है, बल्कि यह लोकतांत्रिक न्याय की दिशा में बड़ा कदम है।”
उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक और स्थानीय भाषाओं का समावेश जरूरी है। ई-कोर्ट्स, वर्चुअल सुनवाई, ई-फाइलिंग जैसी डिजिटल प्रणालियाँ तभी प्रभावी होंगी जब दस्तावेज और आदेश आम नागरिक की भाषा में उपलब्ध हों।
‘Ease of Living’ और ‘Ease of Doing Business’ के लिए ‘Ease of Justice’ जरूरी
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में स्पष्ट कहा कि केवल व्यापारिक और व्यक्तिगत जीवन में सुगमता काफी नहीं है — जब तक न्याय की प्रक्रिया सुगम और सुलभ नहीं होगी, तब तक Ease of Living अधूरी रहेगी।
उन्होंने कहा —
“हमने पिछले 11 वर्षों में Ease of Doing Business और Ease of Living के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन जब तक न्याय की प्रक्रिया आम नागरिक की पहुंच में नहीं होगी, तब तक इन प्रयासों का पूरा लाभ समाज तक नहीं पहुंचेगा।”
मोदी ने न्यायपालिका से अपील की कि वह जनता की भाषा में फैसले और दस्तावेज उपलब्ध कराए ताकि कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार से वंचित न रहे।
आगे की राह: स्थानीयकरण, तकनीकीकरण और मानवीकरण
प्रधानमंत्री ने भविष्य की दिशा स्पष्ट करते हुए कहा कि आने वाले समय में निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं —
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हाईकोर्ट और जिला अदालतों में स्थानीय भाषाओं में फैसले उपलब्ध कराना।
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कानून के मसौदों में भाषा सरलीकरण को प्राथमिक मापदंड बनाना।
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कानून के छात्रों को ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता अभियान से जोड़ना।
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ई-कोर्ट्स, डिजिटल सुनवाई और ई-फाइलिंग को जन-मित्र बनाना।
उन्होंने कहा कि तकनीक और स्थानीयकरण का संतुलन ही आने वाले समय में न्याय प्रणाली की असली ताकत होगा।
निष्कर्ष: न्याय को समझ में आने वाली भाषा में लाना ही सच्चा सुधार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि “न्याय केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह उस व्यक्ति की समझ, भाषा और सुविधा का सवाल है जो न्याय चाहता है।”
जब न्याय की भाषा सरल होगी, जब फैसले अपनी भाषा में मिलेंगे, तब ही सामाजिक न्याय और समानता का सपना साकार होगा।
उन्होंने कहा —
“Ease of Living और Ease of Doing Business तभी सार्थक हैं, जब Ease of Justice सुनिश्चित हो। हमें ऐसा भारत बनाना है जहाँ हर नागरिक अपनी भाषा में न्याय समझ सके और पा सके।”
