—Advertisement—

“पीड़ा कहानी: भारतीय गृहिणी की जीवन संघर्ष, सास बहू रिश्ते, परिवारिक जिम्मेदारियां और महिलाओं के लिए प्रेरक भावनात्मक लघु कहानी”

Author Picture
Published On: 6 November 2025
WhatsApp Image 2025 11 06 at 6.31.41 AM

—Advertisement—

पीड़ा – एक भारतीय गृहिणी की अनकही कहानी

लेखक: डॉ. सुरेंद्र मीणा, नागदा | भावनात्मक लघु कथा | महिला जीवन प्रेरक कहानी

 प्रस्तावना – हर घर की एक अनकही व्यथा

भारतीय समाज में हर गृहिणी के भीतर एक अनकही पीड़ा छिपी होती है — जो मुस्कान के पीछे छिपे त्याग, जिम्मेदारी और अपार प्रेम की कहानी कहती है।
ऐसी ही संवेदनशील और यथार्थपरक कथा है — “पीड़ा”, जिसमें दो पुरानी सहेलियां अपने जीवन की हकीकत साझा करती हैं।


कहानी की शुरुआत – जब मिलीं दो सहेलियां चौपाटी पर

कई महीनों बाद दो पुरानी सहेलियां मोनिका और सुजाता शहर की चौपाटी पर मिलीं।
कॉलेज के दिनों में जिनके पास अनगिनत सपने और हंसी-मज़ाक था, आज वही ज़िंदगी अब दिन-रात की थकान और जिम्मेदारियों में उलझ गई थी।

गर्म कचोरी की खुशबू और समंदर की हवा के बीच, दोनों ने अपनी दिल की बातें साझा करनी शुरू कीं…


 मोनिका की व्यथा – “जिंदगी कोल्हू के बैल सी हो गई है”

मोनिका ने अपने मन का दर्द बयां करते हुए कहा –

“क्या बताऊं यार मोनिका… मेरी ननद दीपा ने तो नाक में दम कर रखा है।
देवर कुणाल के भी रोज हजार नाटक हैं — कब जाता है, कब आता है, कोई ठिकाना नहीं।
सासू मां को अब कम दिखता है, सुनाई भी कम देने लगा है।
ससुर जी रात भर खाँसते रहते हैं, और उनकी दवा-पानी के लिए रात में तीन-चार बार उठना पड़ता है।
पति देव शहर से बाहर नौकरी करते हैं — हफ्ते में बस शनिवार शाम को आते हैं और सोमवार सुबह निकल जाते हैं।
समझ ही नहीं आ रहा… जिंदगी तो कोल्हू के बैल जैसी हो गई है।”

उनके शब्दों में थकान थी, लेकिन आवाज़ में फिर भी मजबूती झलक रही थी।
भारतीय गृहिणी की यही पहचान होती है — थकान के बावजूद सब संभालना।

 सुजाता की कहानी – “हमारे भी वही हाल हैं यार”

मोनिका की बातें सुनते हुए सुजाता ने भी अपनी दबी भावनाएँ साझा कीं।
वो बोली –

“मेरा भी सेम तेरे जैसा ही चल रहा है यार।
क्या सपने देखे थे कॉलेज टाइम में — नौकरी करेंगे, घूमेंगे, अपनी पहचान बनाएंगे…
पर अब सब सेवा-चाकरी और चूल्हा-चौकी में बर्बाद हो गया।
खुद के लिए वक्त ही नहीं बचता। अब तो लगता है जैसे खुद को कहीं खो दिया है।”

दोनों की आंखों में नमी थी, लेकिन हृदय में एक अजीब सुकून भी था — क्योंकि दर्द साझा करने वाला साथी मिल गया था।

एक प्याली कचोरी और कुछ सुकून के पल

बातों-बातों में दोनों ने कचोरी वाले से कहा –

“भैय्या, गर्म कचोरी का नया घान आया क्या? एक-एक कचोरी और देना… और हां, थोड़ी कड़क देना!”

कचोरी वाला मुस्कुराया और पूछा – “हरी चटनी में प्याज-लहसून तो नहीं चलेगा?”
दोनों एक साथ बोलीं –

“नहीं भैया, कॉलेज टाइम से ही प्याज-लहसून नहीं खाते।”

कचोरी वाले ने मुस्कुराकर दो सादी कचोरी अलग-अलग दौनों में रख दी।
दोनों ने पहली बार इतने दिनों बाद कुछ स्वाद लेकर खाया — जैसे कचोरी नहीं, पुरानी दोस्ती का सुकून हो।

 जीवन की सच्चाई – महिलाएं सबके लिए जीती हैं, खुद के लिए नहीं

यह कहानी सिर्फ मोनिका और सुजाता की नहीं, बल्कि हर उस महिला की है जो अपने परिवार के लिए खुद को भूल जाती है।
सुबह से रात तक घर, सास-ससुर, बच्चों, रिश्तेदारों और समाज की उम्मीदों को पूरा करने में वो इतना खो जाती हैं कि अपने सपनों को दबा देती हैं।

यही “पीड़ा” है – जो हर घर की दीवारों में गूंजती है,
पर आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देती।

एक संदेश – खुद के लिए भी जियो

डॉ. सुरेंद्र मीणा की यह लघु कहानी न केवल यथार्थ को उजागर करती है, बल्कि एक संदेश भी देती है –
👉 महिलाओं को अपने जीवन में “स्वयं के लिए” भी समय निकालना चाहिए।
👉 “सेवा” और “समर्पण” के साथ-साथ “स्वयं की पहचान” भी जरूरी है।
👉 जब तक महिलाएं खुद के सपनों को फिर से नहीं जगाएंगी, समाज की संवेदना अधूरी रहेगी।

 लेखक परिचय – डॉ. सुरेंद्र मीणा, नागदा

डॉ. सुरेंद्र मीणा नागदा (मध्यप्रदेश) के प्रख्यात साहित्यकार हैं,
जो अपनी रचनाओं में सामाजिक संवेदना, मानवीय रिश्तों की गहराई और महिला जीवन की वास्तविकताओं को बखूबी अभिव्यक्त करते हैं।
उनकी यह लघु कहानी “पीड़ा” आधुनिक समय में गृहिणियों की मनोस्थिति को संवेदनशील ढंग से दर्शाती है।

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp