देव उठावनी ग्यारस 2025: जब देवता और मनुष्य दोनों जागते हैं
✍️ जयेन्द्र जैन ‘निप्पू चन्देरी’ – कवि, विचारक, राष्ट्रीय गौरव भ्रमणभाष
प्रस्तावना: नींद से जागते देवता, कर्म से जागता मनुष्य
कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी को मनाया जाने वाला देव उठावनी ग्यारस या प्रबोधिनी एकादशी भारत के सबसे पवित्र पर्वों में से एक है। यह वह दिन है जब स्वयं भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और समस्त ब्रह्मांड में पुनः गति, शुभता और सृजन का संचार होता है।
यह दिन केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि आत्मिक और सामाजिक जागृति का प्रतीक है। जब सुबह की हल्की ठंडक, तुलसी चौरे के पास टिमटिमाते दीपक और मंदिरों की घंटियाँ वातावरण को पवित्र करती हैं, तब मनुष्य के भीतर भी एक अदृश्य ऊर्जा का संचार होता है — कर्म की, धर्म की और आत्मचेतना की।
देव उठावनी ग्यारस का महत्व और काल
हिन्दू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी (हरिशयनी एकादशी) के दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है चातुर्मास, जो चार महीने तक चलता है। इस अवधि में विवाह, गृहप्रवेश और अन्य शुभ कार्य वर्जित रहते हैं।
चार महीने बाद जब कार्तिक शुक्ल एकादशी आती है, तो भगवान विष्णु जागते हैं। इसी दिन को प्रबोधिनी एकादशी या देव उठावनी ग्यारस कहा जाता है।
यह दिन जीवन में ठहराव से गति की ओर, निद्रा से कर्म की ओर लौटने का प्रतीक है।
देव उठावनी ग्यारस की कथा – राजा बलि और वामन अवतार
पुराणों में वर्णित देव उठावनी की कथा अत्यंत प्रेरक और दार्शनिक है।
राजा बलि, जो असुर कुल में जन्मे लेकिन दान, धर्म और नीति में श्रेष्ठ थे, तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गए। देवताओं को भय हुआ कि यदि असुर भी धर्म का पालन करने लगें, तो स्वर्ग का संतुलन बिगड़ जाएगा।
देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। तब विष्णु ने वामन अवतार लिया — एक छोटे ब्राह्मण बालक के रूप में।
राजा बलि यज्ञ कर रहे थे। वामन ने उनसे कहा —
“मुझे केवल तीन पग भूमि चाहिए।”
बलि ने सहर्ष दान दे दिया।
वामन ने विराट रूप धारण किया —
एक पग में पृथ्वी, दूसरे में आकाश नाप लिया, तीसरे के लिए स्थान न बचा।
तब बलि ने कहा —
“भगवान, तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए।”
विष्णु ने प्रसन्न होकर उसे पाताल लोक का अधिपति बनाया और कहा —
“चातुर्मास के समय मैं तुम्हारे द्वार पर विश्राम करूँगा।”
चार महीने तक भगवान विष्णु पाताल में विश्राम करते हैं और देव उठावनी एकादशी के दिन पुनः जागकर देवलोक लौटते हैं।
यही कारण है कि इस दिन को देव जागरण पर्व कहा जाता है।
तुलसी विवाह का महत्त्व और कथा
देव उठावनी ग्यारस 2025 के दिन तुलसी विवाह का आयोजन भी किया जाता है।
कथा के अनुसार, असुर जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यंत पतिव्रता थी। उसके तप से जालंधर अजेय था। विष्णु ने छल से वृंदा का पतिव्रत भंग किया ताकि जालंधर का वध संभव हो सके। जब वृंदा को सत्य पता चला, उसने विष्णु को शाप दिया —
“हे विष्णु! तुम पत्थर बन जाओ।”
विष्णु शालिग्राम बन गए और वृंदा के शरीर से तुलसी पौधा उत्पन्न हुआ।
भगवान विष्णु ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए तुलसी से विवाह किया।
तभी से हर वर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी को शालिग्राम और तुलसी विवाह की परंपरा चली आ रही है।
यह विवाह प्रकृति और पुरुष के मिलन का प्रतीक है —
तुलसी पृथ्वी की हरियाली का प्रतीक है,
विष्णु जीवन के पालनकर्ता पुरुष तत्व का।
देव उठावनी ग्यारस के अनुष्ठान और लोक परंपराएँ
भारत के गाँवों और शहरों में इस दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
- घर-घर दीपक जलाए जाते हैं, तुलसी चौरे को फूलों और रंगोली से सजाया जाता है।
- भक्तगण भगवान विष्णु का जागरण कराते हैं और गाते हैं —
“ऊठो देव ऊठो गोविंदा, ऊठो हरि नारायण।” - रात्रि में भजन-कीर्तन, दीपदान और तुलसी विवाह आयोजित किए जाते हैं।
- अगले दिन से शुभ कार्यों का आरंभ होता है — विवाह, गृहप्रवेश, यज्ञ आदि।
यह दिन न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और पारिवारिक दृष्टि से भी नव आरंभ का प्रतीक है।
देव उठावनी का दार्शनिक अर्थ
अगर प्रेमचंद लिखते, तो शायद कहते —
“देव उठावनी का अर्थ यह नहीं कि विष्णु किसी सागर में सोए थे,
बल्कि यह कि मनुष्य के भीतर जो धर्म, करुणा और कर्तव्य सो गया था, उसे जगाना है।”
देव उठावनी हमें सिखाती है कि आलस्य, लोभ और मोह से बाहर निकलकर हम अपने भीतर के विष्णु तत्व को पहचानें।
यह पर्व कहता है — “जागो, क्योंकि जब तक भीतर का देव नहीं जागता, तब तक कोई विष्णु बाहर से नहीं आ सकता।”
समाज के लिए संदेश
आज का युग तकनीक, भौतिकता और दिखावे में उलझा हुआ है। ऐसे में देव उठावनी ग्यारस हमें याद दिलाती है कि धर्म केवल पूजा या आडंबर नहीं, बल्कि कर्म और भावना का संतुलन है।
जब तुलसी के पास एक दीपक टिमटिमाता है, तो वह केवल भगवान के लिए नहीं, बल्कि हमारे भीतर के अंधकार के लिए भी प्रकाश बनता है।
यह दीप हमें बताता है कि चाहे कितनी भी निराशा हो, आशा और भक्ति का दीप जलाते रहना चाहिए।
जैसे प्रेमचंद ने कहा होता —
“जिस समाज में भक्ति का दीप बुझ जाता है, वहाँ शासन और कानून भी अंधे हो जाते हैं।”
इसलिए देव उठावनी हमें सिखाती है कि भीतर का दीप बुझने न दें।
आज के समय में देव उठावनी ग्यारस की प्रासंगिकता
देव उठावनी ग्यारस 2025 केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पुनर्जागरण का संदेश है।
यह हमें प्रेरित करती है कि —
- हम अपने भीतर के विष्णु (धर्म और कर्तव्य) को जगाएँ,
- तुलसी (प्रकृति) की रक्षा करें,
- और बलि (दान और विनम्रता) से सीखें कि शक्ति में नहीं, विनम्रता में ईश्वर का वास है।
जब हर व्यक्ति यह मान ले कि उसका कर्म ही पूजा है, तब हर दिन देव उठावनी बन जाएगा।
निष्कर्ष : देव उठावनी – एक जीवित दर्शन
देव उठावनी ग्यारस केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि जीवन को नई दृष्टि देने वाला दर्शन है।
यह सिखाती है कि जागरण का अर्थ केवल आंखें खोलना नहीं, बल्कि आत्मा को खोल देना है।
जब कार्तिक की रात तुलसी के पास दीपक टिमटिमाता है, तो समझिए —
भगवान ही नहीं,
हम सबके भीतर का मनुष्य भी जाग रहा है।


