भारत गौरव गणनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी को “कालजयी व्यक्तित्व” की उपाधि से सम्मानित किया गया
लेखक: राजेश जैन ‘दद्दू’, इंदौर
अयोध्या, शरद पूर्णिमा 2025 —
आस्था, श्रद्धा और आध्यात्मिकता से ओतप्रोत वातावरण में अयोध्या नगरी में रत्नत्रय महोत्सव के शुभ अवसर पर एक ऐतिहासिक क्षण साकार हुआ, जब जैन समाज की पूज्य गणनी आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी को “कालजयी व्यक्तित्व” की उपाधि से सम्मानित किया गया। यह सम्मान भारत वर्षीय दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी द्वारा माताजी के दीर्घकालिक आध्यात्मिक योगदान, अद्वितीय साहित्य सृजन और धर्मप्रसार के क्षेत्र में उनके असाधारण कार्यों के लिए प्रदान किया गया।
महोत्सव का आयोजन शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर किया गया था, जो स्वयं जैन समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। इस दिन के साथ तीन-तीन संत शिरोमणियों का जन्मदिन भी जुड़ा हुआ था — संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, आचार्य श्री समयसागर जी महाराज, एवं आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी का जन्मोत्सव एक साथ मनाया गया। यह संयोग पूरे जैन समाज के लिए एक दिव्य अवसर बन गया, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु, संत-आर्यिकाएँ और समाजजन अयोध्या पहुंचे।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन ‘दद्दू’ (इंदौर) ने बताया कि इस विशेष अवसर पर पूज्य माताजी के जीवन की उपलब्धियों को विस्तार से स्मरण किया गया। माताजी का जीवन त्याग, साधना और ज्ञान का अद्भुत संगम है। उन्होंने जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों को सरल भाषा में प्रस्तुत कर समाज के हर वर्ग तक पहुँचाने का कार्य किया है। उनके द्वारा रचित अनेक ग्रंथ आज भी अध्यात्म, दर्शन और नीतिशास्त्र के क्षेत्र में मार्गदर्शक माने जाते हैं।
कार्यक्रम के दौरान भव्य पाद-प्रक्षालन विधि, शास्त्र-भेंट, पिच्छी एवं कमंडल भेट जैसी मंगलाचरणीय क्रियाएँ सम्पन्न हुईं। माताजी के पावन चरणों का स्पर्श करने का सौभाग्य उर्मिला हंसमुख गांधी परिवार सहित अनेक श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ। पूरा वातावरण भक्ति और उल्लास से सराबोर था। शंखध्वनि, जयघोष और आरती के स्वर से पूरा परिसर गूंज उठा।
इस अवसर पर वक्ताओं ने माताजी के योगदान को युगप्रेरक बताया। उन्होंने कहा कि आर्यिका ज्ञानमती माताजी न केवल वर्तमान समय की साध्वी हैं, बल्कि वे “कालजयी व्यक्तित्व” हैं — जिनका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक रहेगा। उनके उपदेशों में आत्मजागरण, अहिंसा, संयम और ज्ञान का प्रकाश झलकता है।
समापन अवसर पर उपस्थित समाजजनों ने सामूहिक रूप से यह संकल्प लिया कि माताजी के बताये मार्ग पर चलकर जैन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान देंगे।
अयोध्या की यह ऐतिहासिक संध्या जैन समाज के लिए केवल एक सम्मान समारोह नहीं थी, बल्कि एक प्रेरणादायी क्षण था — जिसने यह सिद्ध कर दिया कि जब साधना और सेवा का संगम होता है, तो व्यक्तित्व काल के पार जाकर “कालजयी” बन जाता है।
