समाज की एकता और नीति के साथ जीवन जियो – आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज
पथरिया (इंदौर समाचार)।
श्रवण संस्कृति के महामहिम चर्या शिरोमणि पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ने पथरिया में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन में नीति, संयम और समता का महत्व बताया। इस अवसर पर धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि आचार्य श्री के वचनों में समाज की अखंडता और मानवता के कल्याण का गहन संदेश छिपा है।
गलत कार्य और गलत विचार से भी बचना आवश्यक
आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा कि –
“गलत कार्य करना ही पाप नहीं है, बल्कि गलत सोचना, गलत सलाह देना और गलत की अनुमोदना करना भी उतना ही हानिकारक है। यदि कोई धर्मात्मा है, तो उसे अपने मन और चित्त को निर्मल रखना चाहिए। यही सच्ची साधना है जो पाप से बचाती है।”
उन्होंने यह भी बताया कि यदि कोई गलत कार्य नहीं कर रहा, तो उसके पीछे सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक प्रतिबंध हो सकते हैं, परंतु सच्चा धर्म वही है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों तक को पवित्र रखता है।
सूर्यमुखी-पुष्प की तरह जियो जीवन
आचार्य श्री ने उपदेश देते हुए कहा –
“भैया! जीवन को सूर्यमुखी पुष्प की तरह जियो। जैसे सूर्यमुखी सूर्य की ओर घूमता है, वैसे ही इंसान को भी धर्मगुरुओं की ओर उन्मुख होना चाहिए। समाज में शांति और आनंद तभी संभव है जब सभी गुरु सेवा और भक्ति में तल्लीन हों।”
समाज और परिवार की एकता पर बल
उन्होंने समझाया कि परिवार और समाज में एकता बनाए रखने के लिए रीति-नीति का ज्ञान होना जरूरी है। यदि कोई विवाद हो जाए, तो समझदारी से हल निकालना चाहिए। छोटे-बड़ों का सम्मान, समाज की अखंडता और आपसी सद्भाव ही सच्चा धर्म है।
पुण्य और नीति वाले को कोई पराजित नहीं कर सकता
आचार्य श्री ने कहा कि जिसके पास पुण्य और नीति है, वह हर जगह सम्मान पाता है। ऐसे पुण्यात्मा के पास आते ही शत्रु भी विनम्र हो जाते हैं।
उन्होंने बताया –
“यदि कभी भाई भी झगड़ने लगे, तो हाथ जोड़कर खड़े हो जाओ और अपने अदृष्ट को निहारो। मान लो कि पूर्व जन्म में हमने उसे कष्ट दिया होगा, तभी आज यह स्थिति आई है। समता धारण कर जीवन जियो, यही शिवत्व और मोक्ष का मार्ग है।”
समत्व भाव ही भगवान बनने का आधार
मुनि भगवंतों के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उपसर्ग आने पर उन्होंने कभी किसी को दोष नहीं दिया, बल्कि समता और समत्व भाव से अदृष्ट को स्वीकार किया। यही भाव उन्हें भगवान बनाने का कारण बना।
