भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना है, जो पार्टी की रणनीति में बड़ा बदलाव दर्शाता है। 2022 में भाजपा ने उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में जगदीप धनखड़ को चुना था, जो मुखर और आक्रामक शैली के नेता माने जाते हैं। मगर अब भाजपा ने अपनी रणनीति में 180 डिग्री परिवर्तन करते हुए ऐसे नेता को चुना है जो सौम्य, समझदार और समावेशी हैं।
सीपी राधाकृष्णन का राजनीतिक सफर लंबा और विचारधारा के साथ जुड़ा हुआ रहा है। वे तमिलनाडु से हैं और ओबीसी वर्ग से आते हैं, जो भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग के लिहाज से महत्वपूर्ण है। दक्षिण India के तमिलनाडु और केरल में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया है। दक्षिण भारत में भाजपा की पैठ अभी कमजोर है और राधाकृष्णन के नाम से वे सियासी संदेश देना चाहते हैं कि वे दक्षिण भारत में भी प्रभावी होंगे।
जगदीप धनखड़ के मुकाबले राधाकृष्णन की राजनीतिक शैली शांत और संवैधानिक है। धनखड़ लंबे समय तक कांग्रेस में भी रहे और संघ से उनका संबंध उतना मजबूत नहीं था, जबकि राधाकृष्णन संघ और भाजपा के आदर्शों के कड़े समर्थक हैं। धनखड़ की उग्रवादी शैली के कारण विपक्षी दलों ने उन पर आरोप भी लगाए थे कि वे निष्पक्ष नहीं हैं। इसके विपरीत, राधाकृष्णन के प्रति विपक्षी दलों के विरोध की संभावना कम बताई जा रही है।
भाजपा ने इस कदम से यह भी संदेश दिया है कि वे संघ की विचारधारा को महत्व देते हैं और ऐसे नेता को उच्च संवैधानिक पद पर देखना चाहते हैं जो पार्टी और संघ के एजेंडे को समझता हो। इसके साथ ही, ओबीसी समाज की व्यापक आबादी को ध्यान में रखते हुए राधाकृष्णन की उम्मीदवारी भाजपा की सामाजिक रणनीति का हिस्सा है।
भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी इस नामांकन की घोषणा करते हुए सभी विपक्षी दलों से समर्थन जुटाने का आह्वान किया है ताकि उपराष्ट्रपति पद के लिए निर्विरोध चुनाव हो सके। भाजपा की इस रणनीति से साफ है कि पार्टी आने वाले दिनों में राजनीतिक संतुलन बनाने, विपक्ष को चुनौती देने और दक्षिण भारत में अपने प्रभाव को मजबूत करने की दिशा में अग्रसर है।
संक्षेप में, भाजपा ने उपराष्ट्रपति पद के लिए ऐसे नेता को अपना उम्मीदवार बनाया है जो न सिर्फ शांत और समावेशी हैं, बल्कि पार्टी और संघ की विचारधारा के भी मजबूत समर्थक हैं। यह फैसला भाजपा की दूरगामी राजनीतिक रणनीति में एक अहम कदम माना जा रहा है, जो आने वाले चुनावों और राजनीतिक परिदृश्य में पार्टी को लाभ पहुंचा सकता है।
