8वें वेतन आयोग में बड़ा बदलाव संभव: महंगाई भत्ते की गणना के लिए नया ‘कॉस्ट ऑफ लिविंग इंडेक्स’ बनाने की मांग तेज
केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की उम्मीदें बढ़ीं
नई दिल्ली। 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) के गठन के साथ ही केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों में नई उम्मीदें बढ़ गई हैं। वेतन संरचना और महंगाई भत्ते (DA) की गणना प्रणाली में बड़े बदलाव की संभावना के बीच कर्मचारी संगठनों ने सरकार के सामने महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे हैं।
ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (AIDEF) ने वेतन आयोग को एक अहम सुझाव सौंपते हुए मौजूदा महंगाई भत्ता गणना प्रणाली में बदलाव की मांग की है। संगठन का कहना है कि वर्तमान प्रणाली कर्मचारियों की वास्तविक जीवन-यापन लागत (Cost of Living) को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं कर पा रही है।
मौजूदा DA गणना प्रणाली पर सवाल
वर्तमान में केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) और पेंशनभोगियों के महंगाई राहत (DR) की गणना ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स फॉर इंडस्ट्रियल वर्कर्स (AICPI-IW) के 12 महीने के औसत के आधार पर की जाती है। यह गणना वर्ष में दो बार संशोधित होती है।
सरकार ने वर्ष 2022–23 में इस इंडेक्स की वस्तुओं की टोकरी (Basket) में बदलाव किया था, जिसके तहत खाद्य एवं पेय पदार्थों का वेटेज 45.86 प्रतिशत से घटाकर 36.75 प्रतिशत कर दिया गया। कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि इसी बदलाव के कारण वास्तविक महंगाई और सरकारी आंकड़ों के बीच अंतर बढ़ गया है।
यूनियनों का दावा: असल महंगाई नहीं हो रही सही तरीके से दर्ज
कर्मचारी यूनियनों का कहना है कि मौजूदा इंडेक्स में हाउसिंग, डिजिटल सेवाओं, मनोरंजन और परिवहन जैसे घटकों को अधिक महत्व दिया गया है, जबकि सामान्य कर्मचारियों की आय का बड़ा हिस्सा भोजन, किराना, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है।
विशेष रूप से निम्न और मध्यम वेतन वर्ग के कर्मचारियों पर इसका अधिक असर पड़ रहा है, क्योंकि उनकी आय का अधिकांश हिस्सा आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं पर ही खर्च होता है। ऐसे में आंकड़ों में महंगाई कम दिखाई देती है, लेकिन वास्तविक जीवन में खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।
पेंशनभोगियों के लिए बढ़ती चुनौतियां
AIDEF ने अपने प्रस्ताव में विशेष रूप से पेंशनभोगियों की स्थिति को भी उजागर किया है। सेवानिवृत्त कर्मचारियों का सबसे बड़ा खर्च दवाइयों, अस्पताल उपचार, स्वास्थ्य बीमा और देखभाल सेवाओं पर होता है।
यूनियनों का कहना है कि भले ही DR (Dearness Relief) समय-समय पर बढ़ाया जाता है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की तेज़ी से बढ़ती कीमतों के कारण पेंशनभोगियों की वास्तविक क्रय शक्ति में गिरावट आती है। इससे उन्हें हर महीने अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
नया ‘कॉस्ट ऑफ लिविंग इंडेक्स’ बनाने की मांग
कर्मचारी संगठनों ने 8वें वेतन आयोग से यह सिफारिश की है कि एक नया और समर्पित ‘कॉस्ट ऑफ लिविंग इंडेक्स’ तैयार किया जाए, जो वास्तविक जीवन-यापन लागत को बेहतर तरीके से दर्शा सके।
इस प्रस्तावित इंडेक्स में निम्नलिखित घटकों को अधिक वेटेज देने की मांग की गई है:
- भोजन और दैनिक उपभोग की वस्तुएं
- स्वास्थ्य सेवाएं और दवाइयां
- आवास और किराया
- बच्चों की शिक्षा
- परिवहन और आवश्यक सेवाएं
यूनियनों का मानना है कि यदि यह नया इंडेक्स लागू किया जाता है तो महंगाई भत्ते (DA), फिटमेंट फैक्टर और वेतन संशोधन अधिक यथार्थपरक और कर्मचारियों के जीवन स्तर के अनुरूप होंगे।
कर्मचारियों के अनुसार मौजूदा व्यवस्था में असंतुलन
कर्मचारी संगठनों का यह भी कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में महंगाई का सही आकलन नहीं हो पा रहा है। जब जरूरी वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तब भी सरकारी आंकड़ों में वृद्धि अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
इससे वेतन वृद्धि और महंगाई भत्ते के बीच एक अंतर बना रहता है, जो अंततः कर्मचारियों की वास्तविक आय पर प्रभाव डालता है।
8वें वेतन आयोग से बड़ी उम्मीदें
8वें वेतन आयोग को लेकर पहले से ही कर्मचारियों में कई अपेक्षाएं हैं। इसमें वेतन संरचना में सुधार, फिटमेंट फैक्टर में वृद्धि और पेंशन प्रणाली में सुधार जैसे मुद्दे शामिल हैं।
अब AIDEF के इस प्रस्ताव ने महंगाई भत्ता गणना प्रणाली को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। यदि आयोग इस सुझाव पर विचार करता है, तो यह कर्मचारियों के वेतन निर्धारण की प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: वास्तविक महंगाई को मापने की चुनौती
कुल मिलाकर, कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की मांग है कि महंगाई भत्ते की गणना केवल आंकड़ों पर आधारित न होकर वास्तविक जीवन-यापन लागत को ध्यान में रखकर की जाए।
8वें वेतन आयोग के सामने यह एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी कि वह ऐसी प्रणाली तैयार करे जो पारदर्शी भी हो और कर्मचारियों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को भी सही ढंग से प्रतिबिंबित कर सके। आने वाले समय में इस प्रस्ताव पर सरकार और वेतन आयोग का रुख बेहद अहम माना जा रहा है।
