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भारत बनेगा “सोने का शेर” – केरल के राज्यपाल ने 3 दिवसीय Narmada Sahitya Manthan का उद्घाटन किया

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Published On: 30 January 2026
Grand Inauguration of the 3 -Day Narmada Sahitya Manthan
— Grand Inauguration of the 3-Day Narmada Sahitya Manthan

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3 दिवसीय Narmada Sahitya Manthan का उद्घाटन समारोह केरल के राज्यपाल श्री राजेंद्र आर्लेकर की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। उद्घाटन सत्र में राज्यपाल ने कहा कि भारत को फिर से विश्व में सम्मान और शक्ति के प्रतीक के रूप में स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि हम स्वबोध की ओर लौटें।

उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए कहा कि पहले कहा जाता था कि भारत “सोने की चिड़िया” था। इतिहास की किताबें भी यही गवाही देती हैं कि हमारे देश की प्राकृतिक संपदाएँ और सांस्कृतिक समृद्धि के कारण विदेशी ताकतों ने भारत पर कब्जा करने की कोशिश की। लेकिन वर्तमान संदर्भ में, यह आवश्यक नहीं कि हम भारत को केवल “सोने की चिड़िया” बनाना चाहें। उन्होंने स्पष्ट किया कि सोने की चिड़िया बनने का अर्थ केवल आर्थिक और भौतिक संपन्नता नहीं है, बल्कि इसके साथ अक्सर लूटमार और आक्रमण की भी परिकल्पना जुड़ी रहती है।

राज्यपाल ने कहा कि इसलिए हमें भारत को सोने का शेर बनाना चाहिए – एक ऐसा राष्ट्र जो शक्तिशाली, आत्मनिर्भर, और स्वाभिमानी हो। यह न केवल आर्थिक रूप से मजबूत होगा, बल्कि अपने निर्णयों और नीतियों में भी स्वतंत्र और मजबूत रहेगा।

स्वबोध: भारत का वास्तविक मार्गदर्शन

श्री आर्लेकर ने अपने भाषण में यह भी रेखांकित किया कि देश की आजादी के बाद से भारतीय नागरिक अपने स्वबोध को भूल गए हैं। आज भी हम अक्सर विकास की कल्पना करते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि इसे प्राप्त करने के लिए मार्ग क्या होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत का वास्तविक उदय तभी संभव है जब हम अपने मन में आने वाले विचारों पर मंथन करेंगे और अपने भीतर की चेतना को जाग्रत करेंगे।

उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद पूरा विश्व भारत पर नजर रखे हुए था। उस समय की सरकारें कभी सोशलिस्ट, कभी कैपिटलिस्ट की नीतियों के अनुसार आगे-पीछे होती रहीं। इस कारण आम नागरिकों में स्वदेशी चेतना और स्वबोध की कमी हुई।

शिक्षा नीति और स्वबोध का नुकसान

राज्यपाल ने यह भी इंगित किया कि हमारी शिक्षा नीतियाँ हमारे उज्जवल अतीत और सांस्कृतिक गौरव के अनुरूप नहीं बनाई गईं। इस वजह से न केवल हमारे नागरिकों ने स्वदेश, स्वभाषा, स्वसंस्कृति, स्वइतिहास और स्वपरंपरा को भूलना शुरू कर दिया, बल्कि विदेशी परंपराओं और विचारों को अपनाना अधिक अच्छा समझा।

उन्होंने जोर देकर कहा कि विकसित भारत केवल आर्थिक विकास से नहीं बनेगा, बल्कि समग्र विकास की दिशा में प्रयास करना होगा। इसका मतलब है कि हर नागरिक को स्वदेशी उत्पादों और सांस्कृतिक धरोहर का समर्थन करना चाहिए। केवल इसी प्रकार हम अपने देश को सशक्त और आत्मनिर्भर बना सकते हैं।

स्वदेशी अपनाने का महत्व

राज्यपाल ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन वस्तुओं का वह उपयोग कर रहा है, वे पूरी तरह से स्वदेशी हों। स्वदेशी अपनाना केवल आर्थिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि जब नागरिक स्वदेशी और स्थानीय संसाधनों का प्रयोग करेंगे, तभी देश वास्तविक अर्थ में आत्मनिर्भर और मजबूत बनेगा।

समारोह में उपस्थित गणमान्य व्यक्ति

Narmada Sahitya Manthan के उद्घाटन सत्र में विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही। इनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:

  • आचार्य श्री मिथलेश शरण नंदिनी महाराज, हनुमत पीठ अयोध्या के पीठाधीश
  • श्री डॉ. पूर्णेन्द्र सक्सेना, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र संघचालक
  • श्री डॉ. राकेश सिंघाई, कुलगुरु, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय
  • श्री दिनेश गुप्ता, अध्यक्ष, विश्व समाज केंद्र, मालवा
  • श्री श्रीरंग पेंढारकर, संयोजक, नर्मदा साहित्य मंथन

इन गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने समारोह की गरिमा और महत्व को और भी बढ़ा दिया।

साहित्यिक मंथन का उद्देश्य

नर्मदा साहित्य मंथन का मुख्य उद्देश्य है भारतीय समाज और संस्कृति के मूल्य, इतिहास, भाषा और साहित्य को जन-जन तक पहुँचाना। यह आयोजन न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि राष्ट्रीय चेतना और स्वदेशी जागरूकता बढ़ाने में भी मदद करता है।

राज्यपाल ने इस अवसर पर सभी उपस्थित साहित्यकारों और विद्वानों से कहा कि वे अपने विचारों और लेखन के माध्यम से लोगों में स्वबोध और राष्ट्रीय आत्मसम्मान को प्रोत्साहित करें। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय साहित्य केवल मनोरंजन या ज्ञान का साधन नहीं, बल्कि यह देश की आत्मा और शक्ति का आईना भी है।

निष्कर्ष

समारोह के अंत में राज्यपाल ने दोबारा जोर देकर कहा कि भारत को केवल “सोने की चिड़िया” नहीं बनाना है, बल्कि स्वबोध और शक्ति के प्रतीक “सोने का शेर” के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए नागरिकों, सरकार और समाज के प्रत्येक वर्ग को मिलकर प्रयास करना होगा। उन्होंने सभी से अपील की कि वे स्वदेशी उत्पादों, संस्कृति, शिक्षा और परंपराओं का सम्मान करें और अपने योगदान से देश को सशक्त बनाने में भाग लें।

इस प्रकार, नर्मदा साहित्य मंथन का उद्घाटन समारोह न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि राष्ट्रीय जागरूकता, स्वदेशी अपनाने और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के संदर्भ में भी ऐतिहासिक बन गया।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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