105 दिवसीय नर्मदा परिक्रमा पूर्ण कर गांव लौटे दिलीप सोलंकी, नगरवासियों ने किया भव्य स्वागत
मां नर्मदा के प्रति अटूट श्रद्धा, गहरी आस्था और दृढ़ संकल्प का अद्भुत उदाहरण उस समय देखने को मिला जब 105 दिनों की कठिन नर्मदा परिक्रमा पूर्ण कर दिलीप सोलंकी अपने गृहग्राम लौटे। उनके गांव आगमन पर पूरे क्षेत्र में उत्साह और भक्ति का माहौल देखने को मिला। ग्रामीणों और समाजजनों ने ढोल-नगाड़ों, पुष्पवर्षा और “नर्मदे हर” के जयघोष के साथ उनका भव्य स्वागत किया।
दिलीप सोलंकी की यह आध्यात्मिक यात्रा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बनी, बल्कि युवाओं और समाज के लिए प्रेरणा का संदेश भी लेकर आई। नगरवासियों ने इसे पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय बताया।
मां नर्मदा की परिक्रमा पूर्ण कर पहुंचे गांव
105 दिनों तक चली इस कठिन धार्मिक यात्रा को सफलतापूर्वक पूर्ण करने के बाद जैसे ही दिलीप सोलंकी गांव की सीमा में पहुंचे, लोगों ने उनका स्वागत करने के लिए बड़ी संख्या में एकत्रित होकर उत्साह प्रकट किया।
ढोल-नगाड़ों की गूंज, जयकारों और फूलों की वर्षा के बीच पूरे गांव का वातावरण भक्तिमय हो गया। महिलाओं ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार आरती उतारकर उनका अभिनंदन किया।
महांकाल राजा के दर्शन के साथ हुआ स्वागत समारोह
गांव पहुंचने के बाद दिलीप सोलंकी ने सबसे पहले मधुकन्या नदी तट स्थित महांकाल राजा मंदिर पहुंचकर दर्शन किए और मां नर्मदा के प्रति आभार व्यक्त किया।
इसके बाद मंदिर परिसर के बाहर सर्व समाज की ओर से स्वागत एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने पुष्पमालाएं पहनाकर उनका सम्मान किया और उनकी कुशलक्षेम पूछी।

कई गणमान्य नागरिक रहे उपस्थित
स्वागत समारोह में बड़ी संख्या में समाजजन, ग्रामीण और श्रद्धालु शामिल हुए। इस दौरान कई प्रमुख लोगों ने भी दिलीप सोलंकी का स्वागत किया। इनमें शामिल रहे:
- शिक्षक हेमेंद्र कुमार जोशी
- हरिराम पडियार
- भूपेंद्र सिंह राठौर सेमलिया
- मनोहर सिंह राठौर सेमलिया
- परीक्षित सिंह राठौर
- नरेंद्र खुडवेल
- गोपाल राठौड़
- कैलाश राठौड़
- मंडल अध्यक्ष जितेंद्र राठौड़
- श्रेणिक कोठारी
- नारायण प्रजापत
- राजेंद्र मिस्त्री
- प्रकाश राठौड़
- एडवोकेट नरेंद्र सोलंकी (झाबुआ)
- नंदू दैय्या
- सुरेश राठौड़
- जगपाल सिंह राठौर
- झमक बर्फा
- शांतिलाल सोलंकी
- रमेश परवार
- मोहन माली
- बबलू राव
- गगन सोलंकी
- देवकुंवर पडियार
सहित अन्य कई समाजजन और ग्रामीण मौजूद रहे।
गांव के प्रमुख मार्गों पर हुआ स्वागत
स्वागत समारोह के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ दिलीप सोलंकी का गांव के प्रमुख मार्गों से जुलूस निकाला गया। जगह-जगह लोगों ने उन्हें पुष्पमालाएं पहनाकर सम्मानित किया।
युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं ने “नर्मदे हर” के जयघोष के साथ पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। गांव में देर रात तक उत्सव जैसा माहौल बना रहा।
नर्मदा परिक्रमा आत्मशुद्धि का मार्ग” – दिलीप सोलंकी
परिक्रमा पूर्ण कर लौटे दिलीप सोलंकी ने अपनी यात्रा के अनुभव साझा करते हुए कहा कि 105 दिनों की यह यात्रा बेहद कठिन थी, लेकिन मां नर्मदा की कृपा और आशीर्वाद से वह सफलतापूर्वक पूरी हो सकी।
उन्होंने कहा कि:
- नर्मदा परिक्रमा केवल धार्मिक यात्रा नहीं है
- यह आत्मशुद्धि और आत्मिक शांति का माध्यम है
- यात्रा के दौरान संयम, धैर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव होता है
- अनेक संत-महात्माओं का आशीर्वाद प्राप्त हुआ
- कई धार्मिक स्थलों के दर्शन का सौभाग्य मिला
युवाओं के लिए प्रेरणा बनी यात्रा
नगरवासियों और समाजजनों ने कहा कि आज के समय में इतनी लंबी और कठिन नर्मदा परिक्रमा पूर्ण करना आसान नहीं है। दिलीप सोलंकी की यह यात्रा युवाओं के लिए प्रेरणादायक है।
लोगों का कहना है कि इस प्रकार की धार्मिक यात्राएं समाज को अपनी संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य करती हैं।
पूरे गांव में रहा उत्सव जैसा माहौल
दिलीप सोलंकी के स्वागत को लेकर पूरे गांव में उत्साह दिखाई दिया। ग्रामीणों ने इसे गांव और क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बताया।
पूरे दिन गांव में भक्तिमय वातावरण बना रहा और लोग मां नर्मदा के जयकारे लगाते रहे। श्रद्धालुओं ने मां नर्मदा से सभी के सुख, समृद्धि और कल्याण की कामना की।
निष्कर्ष
105 दिनों की नर्मदा परिक्रमा पूर्ण कर लौटे दिलीप सोलंकी का स्वागत केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि यह श्रद्धा, संकल्प और आध्यात्मिकता के प्रति समाज की भावना का प्रतीक था। उनकी इस यात्रा ने न केवल धार्मिक आस्था को मजबूत किया, बल्कि युवाओं को भी संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़ने की प्रेरणा दी।
