103 वर्ष की उम्र में नेत्रदान कर पेश की मानवता की मिसाल, दो जरूरतमंदों को मिल सकेगी नई रोशनी
मंडलेश्वर की स्याणी बाई पाटीदार जिराती के निधन के बाद बेटों ने कराया नेत्रदान, पाटीदार समाज ने परिवार के निर्णय की सराहना की
103 वर्ष की उम्र में नेत्रदान किए जाने की यह पहल समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी दे रही है कि मृत्यु के बाद अंग और ऊतक दान के माध्यम से जरूरतमंदों की सहायता की जा सकती है।
दुख की घड़ी में परिवार ने लिया नेत्रदान का फैसला
किसी अपने को खोने के बाद परिवार के लिए निर्णय लेना आसान नहीं होता। स्याणी बाई पाटीदार जिराती के निधन से परिवार शोक में था, लेकिन इसी बीच उनके पुत्रों ने मानव सेवा को प्राथमिकता देते हुए नेत्रदान कराने का फैसला किया।
श्रीराम पाटीदार, जगदीश पाटीदार और ओमजी पाटीदार ने आपसी सहमति से अपनी माताजी के नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी कराई। परिवार के इस फैसले को स्थानीय लोगों ने संवेदनशील और प्रेरणादायी बताया है।
परिजनों का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे समाज में नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संदेश जाता है। परिवार ने व्यक्तिगत दुख के बीच ऐसा निर्णय लिया, जिससे जरूरतमंद व्यक्तियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आने की संभावना है।
दो जरूरतमंदों को मिल सकती है दृष्टि
नेत्रदान में प्राप्त कॉर्नियल ऊतक का चिकित्सकीय परीक्षण और उपयुक्तता निर्धारित होने के बाद जरूरतमंद मरीजों में प्रत्यारोपण किया जा सकता है। सामान्यतः एक नेत्रदाता के कॉर्निया से दो अलग-अलग मरीजों को लाभ मिल सकता है। ऐसे में स्याणी बाई के नेत्रदान से भी दो जरूरतमंद लोगों को लाभ मिलने की संभावना जताई गई है।
नेत्रदान से जुड़ी पूरी प्रक्रिया चिकित्सा मानकों के अनुसार होती है और प्रत्यारोपण का निर्णय संबंधित आई बैंक तथा विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा ऊतक की उपयुक्तता के आधार पर लिया जाता है।
परिवार का कहना है कि यदि उनके इस निर्णय से जरूरतमंद लोगों को दृष्टि मिलती है तो यह स्याणी बाई की स्मृति को हमेशा जीवित रखने वाली सबसे बड़ी मानवीय पहल होगी।
103 वर्ष की आयु में नेत्रदान बना प्रेरणादायी संदेश
स्याणी बाई पाटीदार जिराती ने 103 वर्ष का लंबा जीवन पूरा किया। उनके निधन के बाद परिवार द्वारा नेत्रदान कराने के निर्णय ने क्षेत्र में एक सकारात्मक संदेश दिया है।
अक्सर लोगों में यह धारणा रहती है कि अधिक उम्र होने के कारण नेत्रदान नहीं किया जा सकता, जबकि नेत्रदान के बाद कॉर्निया की चिकित्सकीय उपयुक्तता का निर्णय विशेषज्ञ करते हैं। उम्र के आधार पर स्वयं ही नेत्रदान की संभावना को खारिज करने के बजाय संबंधित आई बैंक या चिकित्सा संस्था से संपर्क करना उचित होता है।
स्याणी बाई के परिवार द्वारा उठाया गया कदम इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने वाला माना जा रहा है। इससे लोगों को यह संदेश मिल रहा है कि मृत्यु के बाद भी मानव सेवा की भावना को आगे बढ़ाया जा सकता है।
नेत्रदान को लेकर समाज में जागरूकता जरूरी
देश में कॉर्नियल दृष्टिहीनता से प्रभावित अनेक मरीज प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसे मरीजों के लिए नेत्रदान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सामाजिक संगठनों और स्वास्थ्य संस्थाओं द्वारा समय-समय पर लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित भी किया जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नेत्रदान का अर्थ पूरा नेत्र किसी व्यक्ति में प्रत्यारोपित करना नहीं होता। आमतौर पर दान किए गए नेत्र से कॉर्नियल ऊतक का उपयोग किया जाता है। इसके बाद विशेषज्ञ चिकित्सक जांच करके यह निर्धारित करते हैं कि ऊतक प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त है या नहीं।
इसलिए नेत्रदान के प्रति फैली भ्रांतियों को दूर करने और लोगों को वैज्ञानिक एवं सही जानकारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
पाटीदार समाज संगठन ने की परिवार की सराहना

जिला पाटीदार समाज संगठन ने स्वर्गीय स्याणी बाई पाटीदार जिराती के नेत्रदान की अनुमोदना करते हुए परिवार के निर्णय की प्रशंसा की है। संगठन से जुड़े लोगों ने कहा कि शोक की घड़ी में भी परिवार ने समाज और मानवता के बारे में सोचकर प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है।
समाज के पदाधिकारियों ने स्याणी बाई को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनके परिवार द्वारा लिया गया फैसला अन्य लोगों को भी नेत्रदान और मानव सेवा के लिए प्रेरित कर सकता है।
संगठन ने श्रीराम पाटीदार, जगदीश पाटीदार और ओमजी पाटीदार द्वारा लिए गए सामूहिक निर्णय को सामाजिक सरोकार की अनुकरणीय पहल बताया।
मृत्यु के बाद भी मानव सेवा का संदेश
नेत्रदान को महादान की भावना से जोड़ा जाता है, क्योंकि इसके माध्यम से मृत्यु के बाद भी किसी जरूरतमंद के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की संभावना रहती है। स्याणी बाई पाटीदार जिराती के परिवार ने इसी भावना को अपने निर्णय के माध्यम से आगे बढ़ाया है।
परिवार के इस कदम से मंडलेश्वर सहित आसपास के क्षेत्र में नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़ने की उम्मीद है। यदि इस तरह की पहल से अन्य परिवार भी प्रेरित होते हैं तो भविष्य में अधिक जरूरतमंद मरीजों तक प्रत्यारोपण के लिए कॉर्नियल ऊतक पहुंच सकते हैं।
स्याणी बाई की स्मृति को मिला मानव सेवा का स्वरूप
103 वर्ष की आयु में दुनिया को अलविदा कहने वाली स्याणी बाई पाटीदार जिराती की स्मृति अब उनके परिवार के इस मानवीय निर्णय से भी जुड़ गई है। उनके निधन का दुख परिवार के लिए गहरा है, लेकिन नेत्रदान के जरिए किसी जरूरतमंद को दृष्टि मिलने की संभावना ने उनकी स्मृति को मानव सेवा का स्वरूप दिया है।
जिला पाटीदार समाज संगठन सहित स्थानीय लोगों ने दिवंगत स्याणी बाई को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए परिवार के निर्णय की सराहना की है। यह पहल समाज को संदेश देती है कि जीवन समाप्त होने के बाद भी नेत्रदान जैसे कार्य के माध्यम से मानवता की सेवा जारी रखी जा सकती है।
