भारत पर 100% टैरिफ का खतरा, पीटर नवारो बोले- Modi और ट्रंप सुलझा लेंगे रूस से तेल का मुद्दा
वॉशिंगटन। रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर भारत और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिकी सीनेट द्वारा रूस से ऊर्जा खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान वाले विधेयक को मंजूरी दिए जाने के बाद भारत पर भी संभावित आर्थिक दबाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो ने भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर बड़ा बयान दिया है।
पीटर नवारो ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छे कामकाजी संबंध हैं और दोनों नेता इस मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में उनके या किसी अन्य समूह के लिए दोनों नेताओं के बीच हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।
PM Modi और Trump के रिश्तों पर Navarro का भरोसा
व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान पीटर नवारो ने भारत के साथ रूस के तेल कारोबार का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में इस तरह की समस्याओं को अलग तरीके से देखा जाता है और राष्ट्रपति ट्रंप तथा प्रधानमंत्री मोदी के बीच अच्छे संबंध हैं।
नवारो के मुताबिक, दोनों नेता आपसी बातचीत के जरिए इस मामले को सुलझा सकते हैं। उनका बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी सीनेट में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ अतिरिक्त शुल्क लगाने से जुड़ा विधेयक पारित हो चुका है।
नवारो ने इस मुद्दे पर अपनी पुरानी टिप्पणियों का भी जिक्र किया। उन्होंने करीब छह से आठ महीने पहले Financial Times में लिखे एक लेख का संदर्भ देते हुए भारत के रूसी तेल कारोबार पर सवाल उठाए थे। उस समय उनकी टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर उन्हें विरोध और आलोचना का सामना भी करना पड़ा था।
भारत पर क्यों मंडरा रहा 100% Tariff का खतरा?
अमेरिकी सीनेट ने 7 अगस्त को एक विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया। रिपोर्ट के अनुसार, इस विधेयक में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है।
इन देशों में भारत और चीन जैसे बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार शामिल हैं। इस प्रस्ताव के पीछे अमेरिका का तर्क है कि रूस से ऊर्जा खरीदने से उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है और इससे यूक्रेन में चल रहे उसके सैन्य अभियानों के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं।
सीनेट में इस विधेयक को 86-11 वोट से मंजूरी मिली। इसे रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के व्यापक अमेरिकी प्रयास के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है।
हालांकि, किसी विधेयक के पारित होने और उसके वास्तविक रूप से लागू होने के बीच कई प्रक्रियाएं होती हैं। इसलिए भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ तत्काल लागू हो गया है, ऐसा मानना सही नहीं होगा। आगे की अमेरिकी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।
क्या है Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act?
रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने से जुड़े इस प्रस्ताव को Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act के नाम से जाना जाता है। यह कानून दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो इसके प्रमुख समर्थकों में शामिल रहे हैं।
विधेयक का दायरा केवल रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित टैरिफ तक सीमित नहीं है। इसमें रूस और ईरान से जुड़े कई क्षेत्रों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के प्रावधान भी शामिल हैं।
इसका उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को प्रभावित करना और उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाना है। अमेरिका का मानना है कि रूस के ऊर्जा क्षेत्र से मिलने वाला राजस्व उसके सैन्य अभियानों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
Putin समेत रूसी अधिकारियों पर भी प्रतिबंधों का प्रस्ताव
इस विधेयक में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ-साथ वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों पर नए प्रतिबंधों की रूपरेखा भी बताई गई है। इसके अलावा वित्तीय संस्थानों और रूस की ऊर्जा परियोजनाओं को भी निशाना बनाने की योजना है।
विधेयक में उन तेल टैंकरों पर भी कार्रवाई बढ़ाने का प्रावधान है जिनका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने और रूसी ऊर्जा से होने वाली आय को जारी रखने के लिए किया जाता है।
इस तरह अमेरिका का प्रस्ताव केवल भारत या चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के तेल कारोबार से जुड़े व्यापक नेटवर्क पर दबाव बनाने की कोशिश करता है।
भारत रूस से क्यों खरीदता है कच्चा तेल?
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव आया था। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रूस ने कई देशों को कच्चा तेल रियायती कीमतों पर उपलब्ध कराया। भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूसी कच्चे तेल की खरीद में वृद्धि की।
भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल कई मौकों पर प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध रहा है। इससे भारत को कच्चे तेल की खरीद लागत को नियंत्रित करने में मदद मिली। भारत दुनिया के प्रमुख ऊर्जा आयातक देशों में शामिल है और घरेलू ईंधन जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है।
भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि उसकी ऊर्जा खरीद का फैसला राष्ट्रीय हित और उपभोक्ताओं की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। ऐसे में रूसी तेल पर अमेरिकी दबाव भारत के लिए केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा विषय है।
अमेरिका के लिए भी भारत महत्वपूर्ण साझेदार
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले वर्षों में रणनीतिक, रक्षा, तकनीक और व्यापार के क्षेत्र में लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच इंडो-पैसिफिक, रक्षा सहयोग और महत्वपूर्ण तकनीकों से जुड़े कई मुद्दों पर साझेदारी है।
ऐसे में रूस से तेल खरीद को लेकर किसी बड़े आर्थिक टकराव की स्थिति दोनों देशों के व्यापक संबंधों को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि पीटर नवारो का बयान महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नवारो ने सीधे तौर पर यह संकेत देने की कोशिश की कि भारत और अमेरिका के बीच इस मुद्दे को बातचीत से सुलझाने की गुंजाइश मौजूद है। उन्होंने ट्रंप और मोदी के बीच अच्छे कामकाजी संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों नेता इस मामले को खुद सुलझा सकते हैं।
भारत के सामने क्या हो सकते हैं विकल्प?
अगर अमेरिका वास्तव में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लागू करता है, तो भारत के सामने ऊर्जा आयात नीति को लेकर कई विकल्पों पर विचार करने की जरूरत पड़ सकती है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस के अलावा पश्चिम एशिया, अमेरिका और अन्य तेल उत्पादक देशों से भी कच्चा तेल खरीदता है। लेकिन रूसी तेल की कीमत, उपलब्धता और आपूर्ति व्यवस्था को देखते हुए अचानक बड़े बदलाव से भारतीय रिफाइनरियों और ऊर्जा बाजार पर असर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, अमेरिकी बाजार भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत को ऊर्जा सुरक्षा, तेल की कीमत, व्यापारिक हित और अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा।
आगे क्या होगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिकी सीनेट से पारित विधेयक आगे किस रूप में लागू होता है और क्या भारत पर वास्तव में 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाता है। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी प्रशासन इस कानून का इस्तेमाल किस तरह करता है और भारत के साथ बातचीत में क्या रास्ता अपनाया जाता है।
पीटर नवारो के बयान से फिलहाल इतना संकेत मिलता है कि अमेरिका और भारत के बीच इस मुद्दे पर बातचीत की संभावना बनी हुई है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के संबंधों को इसका आधार बताया है।
ऐसे में आने वाले दिनों में भारत-अमेरिका के बीच कूटनीतिक बातचीत और अमेरिकी प्रशासन के अगले कदम पर सबकी नजर रहेगी। यदि दोनों देश बातचीत के जरिए कोई समाधान निकालते हैं तो संभावित टैरिफ का खतरा कम हो सकता है। लेकिन यदि अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तो इसका असर भारत के ऊर्जा आयात, व्यापार और दोनों देशों के आर्थिक संबंधों पर पड़ सकता है।
